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‘राज्यपाल-राष्ट्रपति को बिल मंजूरी की समय-सीमा में नहीं बाँध सकते’: SC ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला, जानें- कोर्ट ने क्या-क्या कहा सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ (कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच) ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना ओपिनियन जारी किया। इस 111 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने अपना ही अप्रैल 2025 का फैसला पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय की जा सकती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी समय बीतने पर बिल को अपने आप मंजूर मानने की अवधारणा को असंवैधानिक (Unconstitutional) और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विरुद्ध भी घोषित किया। सुप्रीम कोर्ट के ओपिनियन की शुरुआती लाइन (फोटो साभार: SC) चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदूरकर शामिल थे। बेंच ने कहा कि संविधान ने अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा है। इस लचीलेपन को सख्त समय-सीमा से बाँधना संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें समय-सीमा तय करना असंवैधानिक: अप्रैल 2025 के फैसले में 1 महीने से 3 महीने तक की डेडलाइन तय की गई थी। संवैधानिक पीठ ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगहों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है (जैसे राष्ट्रपति चुनाव 30 दिन में, संसद सत्र 6 महीने में आदि)। जहाँ नहीं लिखी गई, वहाँ यह अनजाने में नहीं छोड़ा गया, बल्कि सोच-समझकर छोड़ा गया है। डीम्ड असेंट का कॉन्सेप्ट खारिज: कोर्ट ने कहा कि अगर समय बीतने पर बिल अपने आप पास हो जाए तो इसका मतलब एक संवैधानिक पद (राज्यपाल/राष्ट्रपति) की जगह दूसरा संवैधानिक पद (न्यायपालिका) ले लेगा। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। शक्तियों के बँटवारे पर सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर: अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया गया कोई भी फैसला (मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना) पूरी तरह गैर-न्यायिक (Non-Justiciable) है। इन्हें कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 361 भी राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने आधिकारिक कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त करता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी बिल के कानून बनने से पहले अदालत दखल नहीं दे सकती: विधायी प्रक्रिया पूरी होने से पहले (यानी बिल के कानून बनने से पहले) अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून बनने के बाद ही उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है। अनुचित देरी पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव: यदि देरी ‘अनुचित, बेहिसाब और बिना किसी स्पष्टीकरण के’ हो जाए, तो संवैधानिक अदालत सीमित दखल दे सकती है। अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि ‘उचित समय के अंदर फैसला लिया जाए’। वह यह नहीं बता सकती कि फैसला क्या होना चाहिए। राज्यपाल के काम में दखल नहीं, सिर्फ निर्देश राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प: मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा विकल्प यानी अनिश्चितकाल तक जेब में रखना संभव नहीं है। ऐसा करना संघीय ढाँचे की भावना के खिलाफ होगा। राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री नहीं: राज्य में दो कार्यपालिकाएँ नहीं चल सकतीं। चुनी हुई सरकार को ड्राइवर की सीट पर रहना है। राज्यपाल ज्यादातर मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे हैं, लेकिन कुछ असाधारण मामलों में विवेकाधिकार का उपयोग कर सकते हैं। संवाद और सहयोग जरूरी: संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव की जगह संवाद अपनाना चाहिए। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत, मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना-यही लोकतंत्र का सही रास्ता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अप्रैल 2025 में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा तय की गई 1-3 महीने की समय-सीमा और डीम्ड असेंट की व्यवस्था संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत थी। उस फैसले में तमिलनाडु के 10 बिलों को बिना राज्यपाल-राष्ट्रपति की मंजूरी के ही कानून घोषित कर दिया गया था, जिसे अब पूरी तरह अवैध ठहराया गया है। VIDEO | Delhi: Supreme Court has ruled that timelines cannot be fixed for the governor and the President for giving assent to bills passed by state assemblies and the judiciary cannot also grant deemed assent to them.Advocate Barun Sinha says, "The Honourable Supreme Court has… pic.twitter.com/zGmaFa7wzY— Press Trust of India (@PTI_News) November 20, 2025 सुप्रीम कोर्ट में प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर क्यों हुई सुनवाई? बता दें कि मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 14 संवैधानिक सवाल भेजे थे। ये सवाल सिर्फ समय-सीमा के नहीं थे, बल्कि पूरे संवैधानिक ढाँचे, शक्तियों के बँटवारे और न्यायपालिका की सीमा से जुड़े थे। राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवाल- जब राज्यपाल के पास बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या विकल्प होते हैं? क्या बिल पर फैसला लेते वक्त राज्यपाल को मंत्रियों की सलाह माननी ही पड़ती है? क्या राज्यपाल का फैसला कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है? क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता? जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है? क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है? क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है? अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है? क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है? क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है? क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है? क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है? क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो? क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं? राष्ट्रपति ने यह रेफरेंस तमिलनाडु मामले में आए अप्रैल 2025 के फैसले के बाद भेजा था, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में चली लंबी सुनवाई, केंद्र सरकार ने भी दी दलील सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ का गठन किया था। जिसमें जून से अक्टूबर 2025 तक दस दिन सुनवाई चली। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पैरवी की। इसमें सरकार की तरफ से कुछ अहम दलीलें दी गई, जिसमें- संविधान में कम से कम 31 स्थानों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है। जहाँ नहीं लिखी, वहाँ जानबूझकर लचीलापन छोड़ा गया है। राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक पद हैं। एक संवैधानिक संस्था दूसरी को आदेश नहीं दे सकती। यदि राज्यपाल बिल रोक रहे हैं तो इसका समाधान राजनीतिक है- मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलें, बात करें। हर समस्या का न्यायिक समाधान नहीं हो सकता। तमिलानाडु मामले की वजह से बढ़ा विवाद साल 2023 से कई राज्यों में कथित तौर पर राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव बढ़ा। इसमें तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने 12 बिलों को महीनों तक रोके रखा। केरल, पंजाब, तेलंगाना में भी यही स्थिति रही। राज्य सरकारों का तर्क था कि राज्यपाल रबर स्टैंप नहीं बल्कि अड़ंगा बन रहे हैं। इस मामले में तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। जिसमें 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 3 अहम बातें कही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने- राज्यपालों को 1-3 महीने की समय-सीमा में बाँध दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड असेंट की व्यवस्था बना दी थी। इसके साथ ही तमिलनाडु असेंबली में पास हुए 10 बिलों को सीधे कानून घोषित कर दिया इस फैसले से हंगामा मच गया। इसे न्यायिक अतिक्रमण करार दिया गया। इस संवैधानिक संकट की स्थिति में पारदर्शिता की और कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के लिए ही राष्ट्रपति ने 14 सवालों वाला रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था। अनुच्छेद 200 और 201 क्या कहते हैं? अनुच्छेद 200: विधानसभा से पारित बिल राज्यपाल के पास जाता है। राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं- मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। पहली बार रोकने पर विधानसभा दोबारा विचार करके भेज सकती है, तब मंजूरी देनी ही पड़ती है। कोर्ट के फैसले की कॉपी में अनुच्छेद 200 का रेफरेंस अनुच्छेद 201: राज्यपाल से राष्ट्रपति को भेजा गया बिल राष्ट्रपति मंजूर कर सकते हैं, रोक सकते हैं या वापस भेज सकते हैं। इसमें समय-सीमा का कोई उल्लेख नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती (1973) के सिद्धांत को दोहराया कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। राज्यपाल संघ और राज्य के बीच सेतु हैं, न कि राज्य सरकार के अधीनस्थ। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि भारत का संघीय ढाँचा ‘केंद्र की ओर झुका हुआ’ है ताकि देश की एकता बनी रहे। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दशकों तक संवैधानिक व्याख्या का आधार बनेगा। कई कानूनी विशेषज्ञ इसे ‘संविधान की जीत’ और ‘लोकतंत्र की परिपक्वता’ का प्रमाण बता रहे हैं। जिसमें राष्ट्रपति ने संवैधानिक तरीके से सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले की गलती को सुधारते हुए सभी बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या की।   Click to listen highlighted text! ‘राज्यपाल-राष्ट्रपति को बिल मंजूरी की समय-सीमा में नहीं बाँध सकते’: SC ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला, जानें- कोर्ट ने क्या-क्या कहा सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ (कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच) ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना ओपिनियन जारी किया। इस 111 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने अपना ही अप्रैल 2025 का फैसला पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय की जा सकती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी समय बीतने पर बिल को अपने आप मंजूर मानने की अवधारणा को असंवैधानिक (Unconstitutional) और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विरुद्ध भी घोषित किया। सुप्रीम कोर्ट के ओपिनियन की शुरुआती लाइन (फोटो साभार: SC) चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदूरकर शामिल थे। बेंच ने कहा कि संविधान ने अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा है। इस लचीलेपन को सख्त समय-सीमा से बाँधना संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें समय-सीमा तय करना असंवैधानिक: अप्रैल 2025 के फैसले में 1 महीने से 3 महीने तक की डेडलाइन तय की गई थी। संवैधानिक पीठ ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगहों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है (जैसे राष्ट्रपति चुनाव 30 दिन में, संसद सत्र 6 महीने में आदि)। जहाँ नहीं लिखी गई, वहाँ यह अनजाने में नहीं छोड़ा गया, बल्कि सोच-समझकर छोड़ा गया है। डीम्ड असेंट का कॉन्सेप्ट खारिज: कोर्ट ने कहा कि अगर समय बीतने पर बिल अपने आप पास हो जाए तो इसका मतलब एक संवैधानिक पद (राज्यपाल/राष्ट्रपति) की जगह दूसरा संवैधानिक पद (न्यायपालिका) ले लेगा। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। शक्तियों के बँटवारे पर सुप्रीम कोर्ट राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर: अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया गया कोई भी फैसला (मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना) पूरी तरह गैर-न्यायिक (Non-Justiciable) है। इन्हें कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 361 भी राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने आधिकारिक कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त करता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी बिल के कानून बनने से पहले अदालत दखल नहीं दे सकती: विधायी प्रक्रिया पूरी होने से पहले (यानी बिल के कानून बनने से पहले) अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून बनने के बाद ही उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है। अनुचित देरी पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव: यदि देरी ‘अनुचित, बेहिसाब और बिना किसी स्पष्टीकरण के’ हो जाए, तो संवैधानिक अदालत सीमित दखल दे सकती है। अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि ‘उचित समय के अंदर फैसला लिया जाए’। वह यह नहीं बता सकती कि फैसला क्या होना चाहिए। राज्यपाल के काम में दखल नहीं, सिर्फ निर्देश राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प: मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा विकल्प यानी अनिश्चितकाल तक जेब में रखना संभव नहीं है। ऐसा करना संघीय ढाँचे की भावना के खिलाफ होगा। राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री नहीं: राज्य में दो कार्यपालिकाएँ नहीं चल सकतीं। चुनी हुई सरकार को ड्राइवर की सीट पर रहना है। राज्यपाल ज्यादातर मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे हैं, लेकिन कुछ असाधारण मामलों में विवेकाधिकार का उपयोग कर सकते हैं। संवाद और सहयोग जरूरी: संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव की जगह संवाद अपनाना चाहिए। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत, मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना-यही लोकतंत्र का सही रास्ता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अप्रैल 2025 में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा तय की गई 1-3 महीने की समय-सीमा और डीम्ड असेंट की व्यवस्था संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत थी। उस फैसले में तमिलनाडु के 10 बिलों को बिना राज्यपाल-राष्ट्रपति की मंजूरी के ही कानून घोषित कर दिया गया था, जिसे अब पूरी तरह अवैध ठहराया गया है। VIDEO | Delhi: Supreme Court has ruled that timelines cannot be fixed for the governor and the President for giving assent to bills passed by state assemblies and the judiciary cannot also grant deemed assent to them.Advocate Barun Sinha says, "The Honourable Supreme Court has… pic.twitter.com/zGmaFa7wzY— Press Trust of India (@PTI_News) November 20, 2025 सुप्रीम कोर्ट में प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर क्यों हुई सुनवाई? बता दें कि मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 14 संवैधानिक सवाल भेजे थे। ये सवाल सिर्फ समय-सीमा के नहीं थे, बल्कि पूरे संवैधानिक ढाँचे, शक्तियों के बँटवारे और न्यायपालिका की सीमा से जुड़े थे। राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवाल- जब राज्यपाल के पास बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या विकल्प होते हैं? क्या बिल पर फैसला लेते वक्त राज्यपाल को मंत्रियों की सलाह माननी ही पड़ती है? क्या राज्यपाल का फैसला कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है? क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता? जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है? क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है? क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है? अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है? क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है? क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है? क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है? क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है? क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो? क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं? राष्ट्रपति ने यह रेफरेंस तमिलनाडु मामले में आए अप्रैल 2025 के फैसले के बाद भेजा था, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में चली लंबी सुनवाई, केंद्र सरकार ने भी दी दलील सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ का गठन किया था। जिसमें जून से अक्टूबर 2025 तक दस दिन सुनवाई चली। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पैरवी की। इसमें सरकार की तरफ से कुछ अहम दलीलें दी गई, जिसमें- संविधान में कम से कम 31 स्थानों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है। जहाँ नहीं लिखी, वहाँ जानबूझकर लचीलापन छोड़ा गया है। राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक पद हैं। एक संवैधानिक संस्था दूसरी को आदेश नहीं दे सकती। यदि राज्यपाल बिल रोक रहे हैं तो इसका समाधान राजनीतिक है- मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलें, बात करें। हर समस्या का न्यायिक समाधान नहीं हो सकता। तमिलानाडु मामले की वजह से बढ़ा विवाद साल 2023 से कई राज्यों में कथित तौर पर राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव बढ़ा। इसमें तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने 12 बिलों को महीनों तक रोके रखा। केरल, पंजाब, तेलंगाना में भी यही स्थिति रही। राज्य सरकारों का तर्क था कि राज्यपाल रबर स्टैंप नहीं बल्कि अड़ंगा बन रहे हैं। इस मामले में तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। जिसमें 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 3 अहम बातें कही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने- राज्यपालों को 1-3 महीने की समय-सीमा में बाँध दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड असेंट की व्यवस्था बना दी थी। इसके साथ ही तमिलनाडु असेंबली में पास हुए 10 बिलों को सीधे कानून घोषित कर दिया इस फैसले से हंगामा मच गया। इसे न्यायिक अतिक्रमण करार दिया गया। इस संवैधानिक संकट की स्थिति में पारदर्शिता की और कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के लिए ही राष्ट्रपति ने 14 सवालों वाला रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था। अनुच्छेद 200 और 201 क्या कहते हैं? अनुच्छेद 200: विधानसभा से पारित बिल राज्यपाल के पास जाता है। राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं- मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। पहली बार रोकने पर विधानसभा दोबारा विचार करके भेज सकती है, तब मंजूरी देनी ही पड़ती है। कोर्ट के फैसले की कॉपी में अनुच्छेद 200 का रेफरेंस अनुच्छेद 201: राज्यपाल से राष्ट्रपति को भेजा गया बिल राष्ट्रपति मंजूर कर सकते हैं, रोक सकते हैं या वापस भेज सकते हैं। इसमें समय-सीमा का कोई उल्लेख नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती (1973) के सिद्धांत को दोहराया कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। राज्यपाल संघ और राज्य के बीच सेतु हैं, न कि राज्य सरकार के अधीनस्थ। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि भारत का संघीय ढाँचा ‘केंद्र की ओर झुका हुआ’ है ताकि देश की एकता बनी रहे। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दशकों तक संवैधानिक व्याख्या का आधार बनेगा। कई कानूनी विशेषज्ञ इसे ‘संविधान की जीत’ और ‘लोकतंत्र की परिपक्वता’ का प्रमाण बता रहे हैं। जिसमें राष्ट्रपति ने संवैधानिक तरीके से सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले की गलती को सुधारते हुए सभी बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या की।

‘राज्यपाल-राष्ट्रपति को बिल मंजूरी की समय-सीमा में नहीं बाँध सकते’: SC ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला, जानें- कोर्ट ने क्या-क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ (कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच) ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना ओपिनियन जारी किया। इस 111 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने अपना ही अप्रैल 2025 का फैसला पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय की जा सकती है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी समय बीतने पर बिल को अपने आप मंजूर मानने की अवधारणा को असंवैधानिक (Unconstitutional) और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विरुद्ध भी घोषित किया।

सुप्रीम कोर्ट के ओपिनियन की शुरुआती लाइन (फोटो साभार: SC)

चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदूरकर शामिल थे। बेंच ने कहा कि संविधान ने अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा है। इस लचीलेपन को सख्त समय-सीमा से बाँधना संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें

समय-सीमा तय करना असंवैधानिक: अप्रैल 2025 के फैसले में 1 महीने से 3 महीने तक की डेडलाइन तय की गई थी। संवैधानिक पीठ ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगहों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है (जैसे राष्ट्रपति चुनाव 30 दिन में, संसद सत्र 6 महीने में आदि)। जहाँ नहीं लिखी गई, वहाँ यह अनजाने में नहीं छोड़ा गया, बल्कि सोच-समझकर छोड़ा गया है।

डीम्ड असेंट का कॉन्सेप्ट खारिज: कोर्ट ने कहा कि अगर समय बीतने पर बिल अपने आप पास हो जाए तो इसका मतलब एक संवैधानिक पद (राज्यपाल/राष्ट्रपति) की जगह दूसरा संवैधानिक पद (न्यायपालिका) ले लेगा। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।

शक्तियों के बँटवारे पर सुप्रीम कोर्ट

राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर: अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया गया कोई भी फैसला (मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना) पूरी तरह गैर-न्यायिक (Non-Justiciable) है। इन्हें कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 361 भी राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने आधिकारिक कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त करता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी

बिल के कानून बनने से पहले अदालत दखल नहीं दे सकती: विधायी प्रक्रिया पूरी होने से पहले (यानी बिल के कानून बनने से पहले) अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून बनने के बाद ही उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है।

अनुचित देरी पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव: यदि देरी ‘अनुचित, बेहिसाब और बिना किसी स्पष्टीकरण के’ हो जाए, तो संवैधानिक अदालत सीमित दखल दे सकती है। अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि ‘उचित समय के अंदर फैसला लिया जाए’। वह यह नहीं बता सकती कि फैसला क्या होना चाहिए।

राज्यपाल के काम में दखल नहीं, सिर्फ निर्देश

राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प: मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा विकल्प यानी अनिश्चितकाल तक जेब में रखना संभव नहीं है। ऐसा करना संघीय ढाँचे की भावना के खिलाफ होगा।

राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री नहीं: राज्य में दो कार्यपालिकाएँ नहीं चल सकतीं। चुनी हुई सरकार को ड्राइवर की सीट पर रहना है। राज्यपाल ज्यादातर मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे हैं, लेकिन कुछ असाधारण मामलों में विवेकाधिकार का उपयोग कर सकते हैं।

संवाद और सहयोग जरूरी: संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव की जगह संवाद अपनाना चाहिए। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत, मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना-यही लोकतंत्र का सही रास्ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अप्रैल 2025 में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा तय की गई 1-3 महीने की समय-सीमा और डीम्ड असेंट की व्यवस्था संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत थी। उस फैसले में तमिलनाडु के 10 बिलों को बिना राज्यपाल-राष्ट्रपति की मंजूरी के ही कानून घोषित कर दिया गया था, जिसे अब पूरी तरह अवैध ठहराया गया है।

VIDEO | Delhi: Supreme Court has ruled that timelines cannot be fixed for the governor and the President for giving assent to bills passed by state assemblies and the judiciary cannot also grant deemed assent to them.Advocate Barun Sinha says, "The Honourable Supreme Court has… pic.twitter.com/zGmaFa7wzY— Press Trust of India (@PTI_News) November 20, 2025

सुप्रीम कोर्ट में प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर क्यों हुई सुनवाई?

बता दें कि मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 14 संवैधानिक सवाल भेजे थे। ये सवाल सिर्फ समय-सीमा के नहीं थे, बल्कि पूरे संवैधानिक ढाँचे, शक्तियों के बँटवारे और न्यायपालिका की सीमा से जुड़े थे। राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवाल-

जब राज्यपाल के पास बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या विकल्प होते हैं?

क्या बिल पर फैसला लेते वक्त राज्यपाल को मंत्रियों की सलाह माननी ही पड़ती है?

क्या राज्यपाल का फैसला कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?

क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?

जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?

क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?

क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?

अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?

क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?

क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?

क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?

क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?

क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?

क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

राष्ट्रपति ने यह रेफरेंस तमिलनाडु मामले में आए अप्रैल 2025 के फैसले के बाद भेजा था, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में चली लंबी सुनवाई, केंद्र सरकार ने भी दी दलील

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ का गठन किया था। जिसमें जून से अक्टूबर 2025 तक दस दिन सुनवाई चली। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पैरवी की। इसमें सरकार की तरफ से कुछ अहम दलीलें दी गई, जिसमें-

संविधान में कम से कम 31 स्थानों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है। जहाँ नहीं लिखी, वहाँ जानबूझकर लचीलापन छोड़ा गया है।

राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक पद हैं। एक संवैधानिक संस्था दूसरी को आदेश नहीं दे सकती।

यदि राज्यपाल बिल रोक रहे हैं तो इसका समाधान राजनीतिक है- मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलें, बात करें। हर समस्या का न्यायिक समाधान नहीं हो सकता।

तमिलानाडु मामले की वजह से बढ़ा विवाद

साल 2023 से कई राज्यों में कथित तौर पर राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव बढ़ा। इसमें तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने 12 बिलों को महीनों तक रोके रखा। केरल, पंजाब, तेलंगाना में भी यही स्थिति रही। राज्य सरकारों का तर्क था कि राज्यपाल रबर स्टैंप नहीं बल्कि अड़ंगा बन रहे हैं।

इस मामले में तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। जिसमें 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 3 अहम बातें कही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने-

राज्यपालों को 1-3 महीने की समय-सीमा में बाँध दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड असेंट की व्यवस्था बना दी थी।

इसके साथ ही तमिलनाडु असेंबली में पास हुए 10 बिलों को सीधे कानून घोषित कर दिया

इस फैसले से हंगामा मच गया। इसे न्यायिक अतिक्रमण करार दिया गया। इस संवैधानिक संकट की स्थिति में पारदर्शिता की और कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के लिए ही राष्ट्रपति ने 14 सवालों वाला रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था।

अनुच्छेद 200 और 201 क्या कहते हैं?

अनुच्छेद 200: विधानसभा से पारित बिल राज्यपाल के पास जाता है। राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं- मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। पहली बार रोकने पर विधानसभा दोबारा विचार करके भेज सकती है, तब मंजूरी देनी ही पड़ती है।

कोर्ट के फैसले की कॉपी में अनुच्छेद 200 का रेफरेंस

अनुच्छेद 201: राज्यपाल से राष्ट्रपति को भेजा गया बिल राष्ट्रपति मंजूर कर सकते हैं, रोक सकते हैं या वापस भेज सकते हैं। इसमें समय-सीमा का कोई उल्लेख नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती (1973) के सिद्धांत को दोहराया कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। राज्यपाल संघ और राज्य के बीच सेतु हैं, न कि राज्य सरकार के अधीनस्थ। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि भारत का संघीय ढाँचा ‘केंद्र की ओर झुका हुआ’ है ताकि देश की एकता बनी रहे।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दशकों तक संवैधानिक व्याख्या का आधार बनेगा। कई कानूनी विशेषज्ञ इसे ‘संविधान की जीत’ और ‘लोकतंत्र की परिपक्वता’ का प्रमाण बता रहे हैं। जिसमें राष्ट्रपति ने संवैधानिक तरीके से सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले की गलती को सुधारते हुए सभी बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या की।

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