Welcome to Lokayukt News   Click to listen highlighted text! Welcome to Lokayukt News
Latest Story
blankभारत की इकोनॉमी की दहाड़, FY26 Q2 में 8.2% GDP ग्रोथ से दुनिया को पीछे छोड़ा: टैरिफ से लेकर ग्लोबल मंदी तक हिंदुस्तान ने सभी चुनौतियों को कैसे दिया मोदी रिफॉर्म्स से जवाबblankन गीता का श्लोक सुन पा रही, न भक्ति भजन… आरफा खानम आपका ये दर्द कैसे होगा कम: मुस्लिम-मुस्लिम करो पर राम मंदिर, भगवा और हिंदुओं से चिढ़ क्योंblankनेपाल ने नए नोट में दी कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा वाले नक्शे को दी जगह, फैसले पर दिखी भारत विरोध की छाप: MEA ने जताई कड़ी आपत्ति, जानें क्या है मामलाblankबाढ़ या भारी बारिश से नहीं सूखे के चलते ‘खत्म हुई’ सिंधु घाटी सभ्यता: दशकों तक बार-बार पड़े अकाल ने कैसे बदला भारत का इतिहास, पढ़ें नए शोध में क्या-क्या आया सामने?blankअमेरिका में तीसरी दुनिया के लोगों की नो-एंट्री, डोनाल्ड ट्रंप ने लगाया स्थाई बैन: जानें- इस थर्ड वर्ल्ड में शामिल हैं कौन से देश, जिन्हें US में माना जा रहा अनवॉन्टेडblankभारत की 75% आबादी भूकंप से हाई रिस्क में, कभी भी डोल सकती है धरती: BIS नक्शे में पूरा हिमालय VI जोन में, जानें- ये बात परेशान करने वाली क्यों है?blankताकि प्रेमानंद महाराज के मार्ग में न दिखे मांस- शराब, गौरक्षक ने की ठेके बंद कराने की माँग: पुलिस ने दक्ष चौधरी को पकड़ा, जानिए FIR की पूरी डिटेल; बागेश्वर बाबा हिंदू कार्यकर्ता के समर्थन में आएblankक्रूज पर्यटन को दिया विस्तार, दुर्गा पूजा को दिलाई UNESCO में पहचान: जानिए मोदी सरकार ने बंगाल टूरिज्म को बढ़ाने के लिए क्या-क्या किया, अब सारा क्रेडिट ले रहीं CM ममता बनर्जीblankइथियोपिया में 12000 साल बाद फटा ज्वालामुखी, दिल्ली तक पहुँची ‘काँच वाली’ राख: फ्लाइट्स के लिए बनी संकट, जानें इसे क्यों माना जा रहा ‘साइलेंट किलर’ ?blank‘ब्राह्मण की बेटी से शादी या संबंध बनने तक आरक्षण’: IAS संतोष वर्मा का नफरती बयान Viral, जानें- फर्जीवाड़े में जेल जा चुका ये जातिवादी विक्षिप्त आखिर है कौन?
राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ: USCIRF की 2025 रिपोर्ट में भारत और हिंदुओं पर निशाना, मुस्लिमों को बताया ‘शांतिदूत’ हर साल यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) एक रिपोर्ट जारी करता है, जिसे वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘स्वतंत्र आँकलन’ बताता है। लेकिन असल में यह रिपोर्ट अक्सर एक निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होती है। इसका निशाना ज्यादातर वे देश बनते हैं, जो अमेरिका की रणनीतिक पसंद या उसके वैचारिक दबावों से पूरी तरह सहमत नहीं होते। भारत, जो 1.4 अरब लोगों का एक सभ्यतागत लोकतंत्र है, ऐसे निशानों में अक्सर शामिल रहा है। इस साल भी USCIRF ने भारत को ‘Countries of Particular Concern (CPC)’ की सूची में डाल दिया और यहाँ तक कि अमेरिका को भारत के लिए अपने हथियार सौदों की समीक्षा करने की सलाह भी दी। इसके राजनीतिक इरादे साफ दिखते हैं। वॉशिंगटन भारत के रूस से तेल खरीदने से नाराज है। यह बात खुद में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका खुद भी रूस के साथ व्यापार जारी रखता है। इसी माहौल में USCIRF की 2025 की रिपोर्ट सामने आती है, जो समझदारी या संतुलन से ज्यादा उसकी गलतियों और पक्षपात के लिए ध्यान आकर्षित करती है। USCIRF ने राम मंदिर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर मिटाया USCIRF रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का जिक्र है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंदिर का उद्घाटन किया जो ‘बाबरी के खंडहरों पर बनाया गया है’, मानो यह किसी तरह का बहुसंख्यकवादी प्रदर्शन हो। जबकि यह समारोह एक लंबे और जटिल विवाद के कानूनी समाधान का परिणाम था, जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद तय किया था। रिपोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर देती है कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सबूत साफ तौर पर दिखाते हैं कि बाबरी ढाँचा एक पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था। पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई, ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज सभी इस जगह को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ के रूप में दर्ज करते हैं। मुगल काल के निर्माण के बाद भी हिंदू लगातार वहीं पूजा करते रहे, जिससे यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि की पहचान बनाए रहा। 2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में दशकों की सुनवाई और सभी साक्ष्यों को तौलने के बाद जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। ऐसे में USCIRF का यह संकेत देना कि यह समारोह किसी तरह का गलत कार्य था, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को हल्के में लेने जैसा है। क्या संगठन यह मानता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार और सुप्रीम कोर्ट अपने ही घरेलू मामलों को न्यायपूर्वक नहीं सुलझा सकते? या फिर USCIRF खुद को भारत के इतिहास और सभ्यता से अधिक जानकार समझता है? दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों को छुपाना: कट्टरपंथियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में बदलना यह रिपोर्ट 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की घटनाओं को भी तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें कहा गया है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और मीरन हैदर को सिर्फ इसलिए जेल में रखा गया है क्योंकि वे CAA के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कर रहे थे। यह दावा न सिर्फ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है। फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग घायल हुए, अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी। यह हिंसा एक सोच-समझकर रची गई साजिश का हिस्सा थी, जिसे एक महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के दौरान अंजाम दिया गया ताकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा किया जा सके। आरोपपत्र में उमर खालिद की एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में पहचान की गई है, जिसमें उनके कॉल रिकॉर्ड, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट, मीटिंगों के सबूत और गवाहियों के आधार पर बताया गया है कि हिंसा की योजना कैसे बनाई गई। शरजील इमाम का वह रिकॉर्डेड भाषण, जिसमें वह भारत के संवेदनशील चिकन नेक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंद करने की बात करता है, साफ दिखाता है कि उसका आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अलगाववादी सोच से प्रेरित था। ऐसे लोगों को ‘निरपराध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी’ बताना न सिर्फ दंगों के पीड़ितों का अपमान है, बल्कि यह भी दिखाता है कि USCIRF किस हद तक जाकर ऐसे व्यक्तियों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी गतिविधियाँ किसी भी तरह शांतिपूर्ण विरोध की सीमा में नहीं आतीं। बुल्डोजर झूठ: कानून प्रवर्तन को सांप्रदायिक उत्पीड़न के रूप में विकृत करना USCIRF का यह दावा भी भ्रामक है कि भारत ने मुस्लिमों की संपत्तियाँ, जिनमें मस्जिदें भी शामिल हैं, इसलिए तोड़ीं क्योंकि वे मुस्लिम-मालिकाना थीं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। देश के कई राज्यों, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि में हुई तोड़फोड़ कार्रवाई गैर-कानूनी कब्जों के खिलाफ थी, जैसे सरकारी जमीन, नदी के किनारे, फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनी अवैध इमारतें। इन कार्रवाइयों का धर्म या पहचान से कोई लेना-देना नहीं था, उद्देश्य केवल जमीन उपयोग के नियमों का पालन करवाना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कई मामलों में तो मस्जिद समितियों ने खुद स्वीकार किया कि कुछ हिस्से वाकई अतिक्रमण पर बने थे और वे उन्हें स्वयं हटाने के लिए भी तैयार थे। लेकिन USCIRF ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक साजिश की तरह दिखाने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, धर्म चाहे कोई भी हो। धर्मांतरण विरोधी कानून: USCIRF का जमीनी हकीकत को स्वीकार करने से इनकार USCIRF की रिपोर्ट में किए गए आरोप भारत के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कानून देश के कई राज्यों ने बनाए हैं और ये सभी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले राज्यों में लागू हैं। इनका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, लालच या शोषण के जरिये होने वाले मजबूरन धर्म-परिवर्तनों को रोकना है। कई जगहों पर दर्ज FIR, शिकायतें और लोगों की गवाही इस तरह की गतिविधियों के बढ़ने की पुष्टि भी करती हैं। भारत के ये कानून स्वैच्छिक धर्म-परिवर्तन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि केवल जबरदस्ती और धोखाधड़ी पर रोक लगाते हैं। साथ ही, भारत की संघीय व्यवस्था राज्यों को यह अधिकार देती है कि वे अपने-अपने हालात के हिसाब से ऐसे कानून बना सकें ताकि स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके। हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों में नई-नई छलपूर्ण रणनीतियों के इस्तेमाल से कमजोर और गरीब तबकों में जबरन या लालच देकर धर्म-परिवर्तन की शिकायतें काफी बढ़ी हैं। इसके बावजूद USCIRF इस पूरे मुद्दे को केवल ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान’ बताकर पेश करती है। वह न तो पीड़ितों की गवाही पर ध्यान देती है और न ही उन समुदायों की चिंताओं पर, जो ऐसे धर्म-परिवर्तन रैकेट्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह दिखाता है कि USCIRF भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थिति और जमीनी सच्चाइयों को समझने की इच्छा ही नहीं रखती। गौरक्षा: USCIRF की सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति जानबूझकर की गई अनदेखी यह रिपोर्ट गाय-संरक्षण कानूनों की आलोचना करते हुए भी वही बात दिखाती है, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की अनिच्छा। भारत में गाय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से गायों की सुरक्षा का उल्लेख है। जिस तरह पश्चिमी देशों में कुछ जानवरों, जैसे घोड़े, कुत्ते या व्हेल, का सेवन सांस्कृतिक कारणों से नियंत्रित या प्रतिबंधित होता है, उसी तरह भारत में गाय-संरक्षण कानून समाज की गहरी परंपराओं और भावनाओं को दर्शाते हैं। लेकिन USCIRF अपनी वैचारिक सोच के कारण इस सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में असफल रहती है। वह इन कानूनों को सीधे-सीधे ‘बहुसंख्यकवाद’ का हथियार बताती है, जिससे उसके सांस्कृतिक भ्रम का पता चलता है, भारत की वास्तविकता का नहीं। यह रिपोर्ट विचारधारा से प्रेरित है, साक्ष्य से नहीं 2025 की USCIRF रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ उसकी गलतियों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सोच में है। हर साल यह आयोग अमेरिका की विदेश-नीति वाली चिंताओं को ही दोहराता है, वह उन देशों की आलोचना करता है जो अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं, लेकिन अमेरिका के पसंदीदा देशों में होने वाले उल्लंघनों को नजरअंदाज कर देता है। भारत पर उसकी टिप्पणी किसी निष्पक्ष समीक्षा जैसी नहीं लगती, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं की लिखी हुई लगती है जो भारत की बहुलतावादी सभ्यता को न समझते हैं और न सम्मान देते हैं। वह भारत से अमेरिकी तरह का सेक्युलरिज्म अपनाने की माँग करता है, जबकि भारत का असली सेक्युलरिज्म सभी धर्मों के समान सम्मान पर आधारित है, न कि बहुसंख्यक समाज को अदृश्य बनाने पर। यह रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष सर्वे नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दस्तावेज जैसी लगती है। यह चुनिंदा आरोपों और पक्षपाती भाषा के जरिए भारत की अदालतों, चुनी हुई सरकारों और कानून व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करती है। धार्मिक आजादी के नाम पर USCIRF वास्तव में दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अधिकारों में दखल देता दिखता है। 2024 और 2023 की रिपोर्टें USCIRF के बहु-वर्षीय दुष्प्रचार अभियान का खुलासा करती हैं 2025 की USCIRF रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है। 2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून। रिपोर्ट ने यहाँ तक सुझाव दिया था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है। 2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है। जायसवाल ने यह भी बताया था कि USCIRF भारत के FCRA और विदेशी फंडिंग नियमों की आलोचना करती है, जबकि अमेरिका में ऐसे नियम भारत से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जबकि अमेरिका भारत पर नफरत-अपराध और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आरोप लगाता है, भारत कई बार अमेरिकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय हमलों, मंदिरों पर हमलों, घृणा-अपराधों और पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों का रिकॉर्ड साझा कर चुका है, लेकिन USCIRF ने इन पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है। कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं, USCIRF हर साल लगभग उन्हीं सीमांत कार्यकर्ताओं, दंगों के आरोपितों, अलगाववादी समर्थकों और माओवादी-संबंधित व्यक्तियों को ‘पीड़ितों’ के रूप में पेश करता है। वही आरोप साल-दर-साल दोहराए जाते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। भारत के कानूनों, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं को अमेरिकी शैक्षणिक दुनिया के चश्मे से देखा जाता है और CPC टैग को एक राजनयिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत की स्थिति का संतुलित या तथ्य-आधारित आँकलन देने की कोशिश की जाती है। भारत को बदनाम करने का वर्षों पुराना अभियान 2025 का USCIRF रिपोर्ट सिर्फ पक्षपाती नहीं है; यह भारत की छवि को लगातार खराब दिखाने की एक लंबी मुहिम का नतीजा है। कई सालों से यह संगठन बार-बार वही आरोप दोहरा रहा है, पुराने और अविश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा कर रहा है, कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज कर रहा है और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की कोशिश ही नहीं करता। ऐसी स्थिति में समस्या भारत में नहीं, बल्कि उस संस्था में है जो मूल्यांकन कर रही है। सच्चाई यह है कि USCIRF भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष आँकलन नहीं कर रहा है, वह एक तयशुदा कहानी गढ़ रहा है। और इसी वजह से उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता अब बेहद संदिग्ध हो चुकी है। यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।   Click to listen highlighted text! राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ: USCIRF की 2025 रिपोर्ट में भारत और हिंदुओं पर निशाना, मुस्लिमों को बताया ‘शांतिदूत’ हर साल यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) एक रिपोर्ट जारी करता है, जिसे वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘स्वतंत्र आँकलन’ बताता है। लेकिन असल में यह रिपोर्ट अक्सर एक निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होती है। इसका निशाना ज्यादातर वे देश बनते हैं, जो अमेरिका की रणनीतिक पसंद या उसके वैचारिक दबावों से पूरी तरह सहमत नहीं होते। भारत, जो 1.4 अरब लोगों का एक सभ्यतागत लोकतंत्र है, ऐसे निशानों में अक्सर शामिल रहा है। इस साल भी USCIRF ने भारत को ‘Countries of Particular Concern (CPC)’ की सूची में डाल दिया और यहाँ तक कि अमेरिका को भारत के लिए अपने हथियार सौदों की समीक्षा करने की सलाह भी दी। इसके राजनीतिक इरादे साफ दिखते हैं। वॉशिंगटन भारत के रूस से तेल खरीदने से नाराज है। यह बात खुद में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका खुद भी रूस के साथ व्यापार जारी रखता है। इसी माहौल में USCIRF की 2025 की रिपोर्ट सामने आती है, जो समझदारी या संतुलन से ज्यादा उसकी गलतियों और पक्षपात के लिए ध्यान आकर्षित करती है। USCIRF ने राम मंदिर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर मिटाया USCIRF रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का जिक्र है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंदिर का उद्घाटन किया जो ‘बाबरी के खंडहरों पर बनाया गया है’, मानो यह किसी तरह का बहुसंख्यकवादी प्रदर्शन हो। जबकि यह समारोह एक लंबे और जटिल विवाद के कानूनी समाधान का परिणाम था, जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद तय किया था। रिपोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर देती है कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सबूत साफ तौर पर दिखाते हैं कि बाबरी ढाँचा एक पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था। पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई, ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज सभी इस जगह को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ के रूप में दर्ज करते हैं। मुगल काल के निर्माण के बाद भी हिंदू लगातार वहीं पूजा करते रहे, जिससे यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि की पहचान बनाए रहा। 2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में दशकों की सुनवाई और सभी साक्ष्यों को तौलने के बाद जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। ऐसे में USCIRF का यह संकेत देना कि यह समारोह किसी तरह का गलत कार्य था, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को हल्के में लेने जैसा है। क्या संगठन यह मानता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार और सुप्रीम कोर्ट अपने ही घरेलू मामलों को न्यायपूर्वक नहीं सुलझा सकते? या फिर USCIRF खुद को भारत के इतिहास और सभ्यता से अधिक जानकार समझता है? दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों को छुपाना: कट्टरपंथियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में बदलना यह रिपोर्ट 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की घटनाओं को भी तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें कहा गया है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और मीरन हैदर को सिर्फ इसलिए जेल में रखा गया है क्योंकि वे CAA के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कर रहे थे। यह दावा न सिर्फ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है। फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग घायल हुए, अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी। यह हिंसा एक सोच-समझकर रची गई साजिश का हिस्सा थी, जिसे एक महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के दौरान अंजाम दिया गया ताकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा किया जा सके। आरोपपत्र में उमर खालिद की एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में पहचान की गई है, जिसमें उनके कॉल रिकॉर्ड, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट, मीटिंगों के सबूत और गवाहियों के आधार पर बताया गया है कि हिंसा की योजना कैसे बनाई गई। शरजील इमाम का वह रिकॉर्डेड भाषण, जिसमें वह भारत के संवेदनशील चिकन नेक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंद करने की बात करता है, साफ दिखाता है कि उसका आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अलगाववादी सोच से प्रेरित था। ऐसे लोगों को ‘निरपराध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी’ बताना न सिर्फ दंगों के पीड़ितों का अपमान है, बल्कि यह भी दिखाता है कि USCIRF किस हद तक जाकर ऐसे व्यक्तियों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी गतिविधियाँ किसी भी तरह शांतिपूर्ण विरोध की सीमा में नहीं आतीं। बुल्डोजर झूठ: कानून प्रवर्तन को सांप्रदायिक उत्पीड़न के रूप में विकृत करना USCIRF का यह दावा भी भ्रामक है कि भारत ने मुस्लिमों की संपत्तियाँ, जिनमें मस्जिदें भी शामिल हैं, इसलिए तोड़ीं क्योंकि वे मुस्लिम-मालिकाना थीं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। देश के कई राज्यों, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि में हुई तोड़फोड़ कार्रवाई गैर-कानूनी कब्जों के खिलाफ थी, जैसे सरकारी जमीन, नदी के किनारे, फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनी अवैध इमारतें। इन कार्रवाइयों का धर्म या पहचान से कोई लेना-देना नहीं था, उद्देश्य केवल जमीन उपयोग के नियमों का पालन करवाना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कई मामलों में तो मस्जिद समितियों ने खुद स्वीकार किया कि कुछ हिस्से वाकई अतिक्रमण पर बने थे और वे उन्हें स्वयं हटाने के लिए भी तैयार थे। लेकिन USCIRF ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक साजिश की तरह दिखाने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, धर्म चाहे कोई भी हो। धर्मांतरण विरोधी कानून: USCIRF का जमीनी हकीकत को स्वीकार करने से इनकार USCIRF की रिपोर्ट में किए गए आरोप भारत के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कानून देश के कई राज्यों ने बनाए हैं और ये सभी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले राज्यों में लागू हैं। इनका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, लालच या शोषण के जरिये होने वाले मजबूरन धर्म-परिवर्तनों को रोकना है। कई जगहों पर दर्ज FIR, शिकायतें और लोगों की गवाही इस तरह की गतिविधियों के बढ़ने की पुष्टि भी करती हैं। भारत के ये कानून स्वैच्छिक धर्म-परिवर्तन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि केवल जबरदस्ती और धोखाधड़ी पर रोक लगाते हैं। साथ ही, भारत की संघीय व्यवस्था राज्यों को यह अधिकार देती है कि वे अपने-अपने हालात के हिसाब से ऐसे कानून बना सकें ताकि स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके। हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों में नई-नई छलपूर्ण रणनीतियों के इस्तेमाल से कमजोर और गरीब तबकों में जबरन या लालच देकर धर्म-परिवर्तन की शिकायतें काफी बढ़ी हैं। इसके बावजूद USCIRF इस पूरे मुद्दे को केवल ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान’ बताकर पेश करती है। वह न तो पीड़ितों की गवाही पर ध्यान देती है और न ही उन समुदायों की चिंताओं पर, जो ऐसे धर्म-परिवर्तन रैकेट्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह दिखाता है कि USCIRF भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थिति और जमीनी सच्चाइयों को समझने की इच्छा ही नहीं रखती। गौरक्षा: USCIRF की सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति जानबूझकर की गई अनदेखी यह रिपोर्ट गाय-संरक्षण कानूनों की आलोचना करते हुए भी वही बात दिखाती है, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की अनिच्छा। भारत में गाय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से गायों की सुरक्षा का उल्लेख है। जिस तरह पश्चिमी देशों में कुछ जानवरों, जैसे घोड़े, कुत्ते या व्हेल, का सेवन सांस्कृतिक कारणों से नियंत्रित या प्रतिबंधित होता है, उसी तरह भारत में गाय-संरक्षण कानून समाज की गहरी परंपराओं और भावनाओं को दर्शाते हैं। लेकिन USCIRF अपनी वैचारिक सोच के कारण इस सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में असफल रहती है। वह इन कानूनों को सीधे-सीधे ‘बहुसंख्यकवाद’ का हथियार बताती है, जिससे उसके सांस्कृतिक भ्रम का पता चलता है, भारत की वास्तविकता का नहीं। यह रिपोर्ट विचारधारा से प्रेरित है, साक्ष्य से नहीं 2025 की USCIRF रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ उसकी गलतियों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सोच में है। हर साल यह आयोग अमेरिका की विदेश-नीति वाली चिंताओं को ही दोहराता है, वह उन देशों की आलोचना करता है जो अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं, लेकिन अमेरिका के पसंदीदा देशों में होने वाले उल्लंघनों को नजरअंदाज कर देता है। भारत पर उसकी टिप्पणी किसी निष्पक्ष समीक्षा जैसी नहीं लगती, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं की लिखी हुई लगती है जो भारत की बहुलतावादी सभ्यता को न समझते हैं और न सम्मान देते हैं। वह भारत से अमेरिकी तरह का सेक्युलरिज्म अपनाने की माँग करता है, जबकि भारत का असली सेक्युलरिज्म सभी धर्मों के समान सम्मान पर आधारित है, न कि बहुसंख्यक समाज को अदृश्य बनाने पर। यह रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष सर्वे नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दस्तावेज जैसी लगती है। यह चुनिंदा आरोपों और पक्षपाती भाषा के जरिए भारत की अदालतों, चुनी हुई सरकारों और कानून व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करती है। धार्मिक आजादी के नाम पर USCIRF वास्तव में दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अधिकारों में दखल देता दिखता है। 2024 और 2023 की रिपोर्टें USCIRF के बहु-वर्षीय दुष्प्रचार अभियान का खुलासा करती हैं 2025 की USCIRF रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है। 2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून। रिपोर्ट ने यहाँ तक सुझाव दिया था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है। 2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है। जायसवाल ने यह भी बताया था कि USCIRF भारत के FCRA और विदेशी फंडिंग नियमों की आलोचना करती है, जबकि अमेरिका में ऐसे नियम भारत से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जबकि अमेरिका भारत पर नफरत-अपराध और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आरोप लगाता है, भारत कई बार अमेरिकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय हमलों, मंदिरों पर हमलों, घृणा-अपराधों और पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों का रिकॉर्ड साझा कर चुका है, लेकिन USCIRF ने इन पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है। कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं, USCIRF हर साल लगभग उन्हीं सीमांत कार्यकर्ताओं, दंगों के आरोपितों, अलगाववादी समर्थकों और माओवादी-संबंधित व्यक्तियों को ‘पीड़ितों’ के रूप में पेश करता है। वही आरोप साल-दर-साल दोहराए जाते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। भारत के कानूनों, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं को अमेरिकी शैक्षणिक दुनिया के चश्मे से देखा जाता है और CPC टैग को एक राजनयिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत की स्थिति का संतुलित या तथ्य-आधारित आँकलन देने की कोशिश की जाती है। भारत को बदनाम करने का वर्षों पुराना अभियान 2025 का USCIRF रिपोर्ट सिर्फ पक्षपाती नहीं है; यह भारत की छवि को लगातार खराब दिखाने की एक लंबी मुहिम का नतीजा है। कई सालों से यह संगठन बार-बार वही आरोप दोहरा रहा है, पुराने और अविश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा कर रहा है, कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज कर रहा है और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की कोशिश ही नहीं करता। ऐसी स्थिति में समस्या भारत में नहीं, बल्कि उस संस्था में है जो मूल्यांकन कर रही है। सच्चाई यह है कि USCIRF भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष आँकलन नहीं कर रहा है, वह एक तयशुदा कहानी गढ़ रहा है। और इसी वजह से उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता अब बेहद संदिग्ध हो चुकी है। यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ: USCIRF की 2025 रिपोर्ट में भारत और हिंदुओं पर निशाना, मुस्लिमों को बताया ‘शांतिदूत’

हर साल यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) एक रिपोर्ट जारी करता है, जिसे वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘स्वतंत्र आँकलन’ बताता है। लेकिन असल में यह रिपोर्ट अक्सर एक निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होती है।

इसका निशाना ज्यादातर वे देश बनते हैं, जो अमेरिका की रणनीतिक पसंद या उसके वैचारिक दबावों से पूरी तरह सहमत नहीं होते। भारत, जो 1.4 अरब लोगों का एक सभ्यतागत लोकतंत्र है, ऐसे निशानों में अक्सर शामिल रहा है।

इस साल भी USCIRF ने भारत को ‘Countries of Particular Concern (CPC)’ की सूची में डाल दिया और यहाँ तक कि अमेरिका को भारत के लिए अपने हथियार सौदों की समीक्षा करने की सलाह भी दी।

इसके राजनीतिक इरादे साफ दिखते हैं। वॉशिंगटन भारत के रूस से तेल खरीदने से नाराज है। यह बात खुद में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका खुद भी रूस के साथ व्यापार जारी रखता है। इसी माहौल में USCIRF की 2025 की रिपोर्ट सामने आती है, जो समझदारी या संतुलन से ज्यादा उसकी गलतियों और पक्षपात के लिए ध्यान आकर्षित करती है।

USCIRF ने राम मंदिर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर मिटाया

USCIRF रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का जिक्र है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंदिर का उद्घाटन किया जो ‘बाबरी के खंडहरों पर बनाया गया है’, मानो यह किसी तरह का बहुसंख्यकवादी प्रदर्शन हो।

जबकि यह समारोह एक लंबे और जटिल विवाद के कानूनी समाधान का परिणाम था, जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद तय किया था। रिपोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर देती है कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सबूत साफ तौर पर दिखाते हैं कि बाबरी ढाँचा एक पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था।

पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई, ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज सभी इस जगह को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ के रूप में दर्ज करते हैं। मुगल काल के निर्माण के बाद भी हिंदू लगातार वहीं पूजा करते रहे, जिससे यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि की पहचान बनाए रहा।

2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में दशकों की सुनवाई और सभी साक्ष्यों को तौलने के बाद जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। ऐसे में USCIRF का यह संकेत देना कि यह समारोह किसी तरह का गलत कार्य था, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को हल्के में लेने जैसा है।

क्या संगठन यह मानता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार और सुप्रीम कोर्ट अपने ही घरेलू मामलों को न्यायपूर्वक नहीं सुलझा सकते? या फिर USCIRF खुद को भारत के इतिहास और सभ्यता से अधिक जानकार समझता है?

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों को छुपाना: कट्टरपंथियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में बदलना

यह रिपोर्ट 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की घटनाओं को भी तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें कहा गया है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और मीरन हैदर को सिर्फ इसलिए जेल में रखा गया है क्योंकि वे CAA के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कर रहे थे। यह दावा न सिर्फ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है।

फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग घायल हुए, अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी। यह हिंसा एक सोच-समझकर रची गई साजिश का हिस्सा थी, जिसे एक महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के दौरान अंजाम दिया गया ताकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा किया जा सके।

आरोपपत्र में उमर खालिद की एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में पहचान की गई है, जिसमें उनके कॉल रिकॉर्ड, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट, मीटिंगों के सबूत और गवाहियों के आधार पर बताया गया है कि हिंसा की योजना कैसे बनाई गई।

शरजील इमाम का वह रिकॉर्डेड भाषण, जिसमें वह भारत के संवेदनशील चिकन नेक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंद करने की बात करता है, साफ दिखाता है कि उसका आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अलगाववादी सोच से प्रेरित था।

ऐसे लोगों को ‘निरपराध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी’ बताना न सिर्फ दंगों के पीड़ितों का अपमान है, बल्कि यह भी दिखाता है कि USCIRF किस हद तक जाकर ऐसे व्यक्तियों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी गतिविधियाँ किसी भी तरह शांतिपूर्ण विरोध की सीमा में नहीं आतीं।

बुल्डोजर झूठ: कानून प्रवर्तन को सांप्रदायिक उत्पीड़न के रूप में विकृत करना

USCIRF का यह दावा भी भ्रामक है कि भारत ने मुस्लिमों की संपत्तियाँ, जिनमें मस्जिदें भी शामिल हैं, इसलिए तोड़ीं क्योंकि वे मुस्लिम-मालिकाना थीं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

देश के कई राज्यों, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि में हुई तोड़फोड़ कार्रवाई गैर-कानूनी कब्जों के खिलाफ थी, जैसे सरकारी जमीन, नदी के किनारे, फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनी अवैध इमारतें।

इन कार्रवाइयों का धर्म या पहचान से कोई लेना-देना नहीं था, उद्देश्य केवल जमीन उपयोग के नियमों का पालन करवाना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कई मामलों में तो मस्जिद समितियों ने खुद स्वीकार किया कि कुछ हिस्से वाकई अतिक्रमण पर बने थे और वे उन्हें स्वयं हटाने के लिए भी तैयार थे।

लेकिन USCIRF ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक साजिश की तरह दिखाने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, धर्म चाहे कोई भी हो।

धर्मांतरण विरोधी कानून: USCIRF का जमीनी हकीकत को स्वीकार करने से इनकार

USCIRF की रिपोर्ट में किए गए आरोप भारत के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कानून देश के कई राज्यों ने बनाए हैं और ये सभी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले राज्यों में लागू हैं।

इनका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, लालच या शोषण के जरिये होने वाले मजबूरन धर्म-परिवर्तनों को रोकना है। कई जगहों पर दर्ज FIR, शिकायतें और लोगों की गवाही इस तरह की गतिविधियों के बढ़ने की पुष्टि भी करती हैं।

भारत के ये कानून स्वैच्छिक धर्म-परिवर्तन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि केवल जबरदस्ती और धोखाधड़ी पर रोक लगाते हैं। साथ ही, भारत की संघीय व्यवस्था राज्यों को यह अधिकार देती है कि वे अपने-अपने हालात के हिसाब से ऐसे कानून बना सकें ताकि स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके।

हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों में नई-नई छलपूर्ण रणनीतियों के इस्तेमाल से कमजोर और गरीब तबकों में जबरन या लालच देकर धर्म-परिवर्तन की शिकायतें काफी बढ़ी हैं। इसके बावजूद USCIRF इस पूरे मुद्दे को केवल ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान’ बताकर पेश करती है।

वह न तो पीड़ितों की गवाही पर ध्यान देती है और न ही उन समुदायों की चिंताओं पर, जो ऐसे धर्म-परिवर्तन रैकेट्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह दिखाता है कि USCIRF भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थिति और जमीनी सच्चाइयों को समझने की इच्छा ही नहीं रखती।

गौरक्षा: USCIRF की सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति जानबूझकर की गई अनदेखी

यह रिपोर्ट गाय-संरक्षण कानूनों की आलोचना करते हुए भी वही बात दिखाती है, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की अनिच्छा। भारत में गाय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से गायों की सुरक्षा का उल्लेख है।

जिस तरह पश्चिमी देशों में कुछ जानवरों, जैसे घोड़े, कुत्ते या व्हेल, का सेवन सांस्कृतिक कारणों से नियंत्रित या प्रतिबंधित होता है, उसी तरह भारत में गाय-संरक्षण कानून समाज की गहरी परंपराओं और भावनाओं को दर्शाते हैं।

लेकिन USCIRF अपनी वैचारिक सोच के कारण इस सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में असफल रहती है। वह इन कानूनों को सीधे-सीधे ‘बहुसंख्यकवाद’ का हथियार बताती है, जिससे उसके सांस्कृतिक भ्रम का पता चलता है, भारत की वास्तविकता का नहीं।

यह रिपोर्ट विचारधारा से प्रेरित है, साक्ष्य से नहीं

2025 की USCIRF रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ उसकी गलतियों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सोच में है। हर साल यह आयोग अमेरिका की विदेश-नीति वाली चिंताओं को ही दोहराता है, वह उन देशों की आलोचना करता है जो अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं, लेकिन अमेरिका के पसंदीदा देशों में होने वाले उल्लंघनों को नजरअंदाज कर देता है।

भारत पर उसकी टिप्पणी किसी निष्पक्ष समीक्षा जैसी नहीं लगती, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं की लिखी हुई लगती है जो भारत की बहुलतावादी सभ्यता को न समझते हैं और न सम्मान देते हैं। वह भारत से अमेरिकी तरह का सेक्युलरिज्म अपनाने की माँग करता है, जबकि भारत का असली सेक्युलरिज्म सभी धर्मों के समान सम्मान पर आधारित है, न कि बहुसंख्यक समाज को अदृश्य बनाने पर।

यह रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष सर्वे नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दस्तावेज जैसी लगती है। यह चुनिंदा आरोपों और पक्षपाती भाषा के जरिए भारत की अदालतों, चुनी हुई सरकारों और कानून व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करती है। धार्मिक आजादी के नाम पर USCIRF वास्तव में दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अधिकारों में दखल देता दिखता है।

2024 और 2023 की रिपोर्टें USCIRF के बहु-वर्षीय दुष्प्रचार अभियान का खुलासा करती हैं

2025 की USCIRF रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है।

2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।

रिपोर्ट ने यहाँ तक सुझाव दिया था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।

2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है।

जायसवाल ने यह भी बताया था कि USCIRF भारत के FCRA और विदेशी फंडिंग नियमों की आलोचना करती है, जबकि अमेरिका में ऐसे नियम भारत से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जबकि अमेरिका भारत पर नफरत-अपराध और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आरोप लगाता है, भारत कई बार अमेरिकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय हमलों, मंदिरों पर हमलों, घृणा-अपराधों और पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों का रिकॉर्ड साझा कर चुका है, लेकिन USCIRF ने इन पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं, USCIRF हर साल लगभग उन्हीं सीमांत कार्यकर्ताओं, दंगों के आरोपितों, अलगाववादी समर्थकों और माओवादी-संबंधित व्यक्तियों को ‘पीड़ितों’ के रूप में पेश करता है।

वही आरोप साल-दर-साल दोहराए जाते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। भारत के कानूनों, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं को अमेरिकी शैक्षणिक दुनिया के चश्मे से देखा जाता है और CPC टैग को एक राजनयिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत की स्थिति का संतुलित या तथ्य-आधारित आँकलन देने की कोशिश की जाती है।

भारत को बदनाम करने का वर्षों पुराना अभियान

2025 का USCIRF रिपोर्ट सिर्फ पक्षपाती नहीं है; यह भारत की छवि को लगातार खराब दिखाने की एक लंबी मुहिम का नतीजा है। कई सालों से यह संगठन बार-बार वही आरोप दोहरा रहा है, पुराने और अविश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा कर रहा है, कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज कर रहा है और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की कोशिश ही नहीं करता।

ऐसी स्थिति में समस्या भारत में नहीं, बल्कि उस संस्था में है जो मूल्यांकन कर रही है। सच्चाई यह है कि USCIRF भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष आँकलन नहीं कर रहा है, वह एक तयशुदा कहानी गढ़ रहा है। और इसी वजह से उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता अब बेहद संदिग्ध हो चुकी है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

  • blank

    Related Posts

    • blank
    • November 29, 2025
    • 20 views
    भारत की इकोनॉमी की दहाड़, FY26 Q2 में 8.2% GDP ग्रोथ से दुनिया को पीछे छोड़ा: टैरिफ से लेकर ग्लोबल मंदी तक हिंदुस्तान ने सभी चुनौतियों को कैसे दिया मोदी रिफॉर्म्स से जवाब

    वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक मंदी की चुनौतियों को करारा जवाब देते हुए 8.2% की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय…

    • blank
    • November 29, 2025
    • 19 views
    न गीता का श्लोक सुन पा रही, न भक्ति भजन… आरफा खानम आपका ये दर्द कैसे होगा कम: मुस्लिम-मुस्लिम करो पर राम मंदिर, भगवा और हिंदुओं से चिढ़ क्यों

    अपनी इस्लामी पत्रकारिता के लिए कु्ख्यात आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर सोशल मीडिया पर रोना-धोना मचाए हुए हैं। आरफा खानम का दुख ये है कि आखिर ये जो टीवी…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    error: Content is protected !!
    Click to listen highlighted text!