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कुर्मी के राज, भूमिहार राजा, पांडे जी, चले ला अहिरान के, गोली चलेला बबुआन के… बिहार को जाति नहीं, जातीय दंभ से डराते इन गानों से चाहिए मुक्ति ‘RJD के माल हई रे’ और ‘यादव का माल हई रे’ जैसे गाने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में खूब चर्चा में रहे। केवल यही नहीं राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण जाति पर भी ऐसे गाने बने हैं, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हैं। ऐसे गानों ने बिहार में जातिवाद फैलाने की कोशिश की, जिससे समाज में नफरत फैलती है। जाति के आधार पर दूसरों को नीचा दिखाने वाले ऐसे गाने समाज में भेदभाव को हवा देते हैं। खासकर चुनावों के समय सोशल मीडिया और लोक-कार्यक्रमों में ऐसे गानों का इस्तेमाल बढ़ जाता है। इससे चुनाव केवल जातिवाद के केंद्र में सिमटकर रह जाते हैं। इन जातिगत गानों से समाज को प्रभावित होने से बचाने की जरूरत है। कौन-कौन से जातिवादी गाने बनाए गए? बिहार में ऐसे कई गानें बने हैं, जिनसे केवल एक खास जाति को निशाना बनाया गया है। इनमें यादव, ब्राह्मणों, राजपूत, भूमिहार से लेकर सभी जाति के गाने बनाए गए हैं। ये गाने जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं। कुछ जातिवाद फैलाने वाले लोकप्रिय गाने हैं- ‘आरा में चले ला अहिरान के‘- जहाँ यादव जाति का ही प्रभुत्व दिखाया जाता है। ‘पांडे जी का बेटा हूँ‘ गाना ब्राह्मणों के लिए बनाया गया है। ‘गोली चलेला बबुआन के बारात में‘- ये गाना राजपूत जाति को लेकर बनाया गया है। ‘हमके मरदे चाहिले भूमिहार राजा जी‘- भूमिहार जाति को लेकर बनाया गया है। ‘न गले वाला दाल हिया रे, ई ता RJD के माल हई रे‘- ये गाना RJD के समर्थकों और यादव जाति को टारगेट कर बनाया है। ‘कुर्मी के राज चलि‘- ये गाना कुर्मी समाज को टारगेट कर बनाया गया है। जातिगत गीत प्रचलित होने की वजह क्या है? ऐसे जातिगत गाने प्रचलित भी जल्दी हो जाते हैं। इनकी वजह है बिहार का डीजे कल्चर, खासकर शादी-ब्याह, जुलूस और चुनावी रैलियों में बजने वाले गानों का प्रभाव बेहद व्यापक होता है। जब ऐसे अवसरों पर जातिगत गाने तेज आवाज में बजाए जाते हैं तो वे सुनने वालों के दिमाग में अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी के लिए ‘नीचा’ वाला भाव जागृत करते हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दलों के समर्थक ऐसे गानों की रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाकर शेयर करते हैं ताकि अपनी जाति के मतदाताओं पर प्रभाव छोड़ सकें। ये वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स जैसे प्लैटफॉर्म पर जल्दी वायरल होते हैं और वोटरों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। वहीं शादी समारोह जैसे सार्वजनिक अवसरों पर ये गाने डीजे या चलती धुन के रूप में बजाए जाते हैं। इन्हें लोकल सिंगर्स और स्टेज आर्टिस्ट गाते हैं, जिन्हें गानों में जातिगत संदर्भ जोड़ने का फायदा होता है क्योंकि इससे उनकी लोकप्रियता और पहचान बढ़ती है। इससे भी अधिक चुनावी माहौल में इन गानों का गहरा असर आम जनता पर पड़ता है। चुनावी माहौल में राजनीतिक दल इन जातिगत गानों से जाति के आधार पर अपने मतदाताओं को आकर्षित करते हैं। ये सब ‘जाति-आधारित संदेश’ फैलाने से शुरू होता है, जो समाज में जहर बनकर सामने आता है। जातिगत गीतों से समाज में क्या समस्या हो रही है? सोशल मीडिया के जमाने में इन जातिगत गानों का चलन बढ़ता जा रहा है। शॉर्ट वीडियो की ‘डोज’ के साथ ये गाने लाखों लोगों के बीच वायरल हो जाते हैं। और जिन जाति के गाने होते हैं, वे एक-दूसरे के खिलाफ नफरत पर उतर पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि एक पढ़ा-लिखा सामान्य युवक और स्कूली बच्चे तक इन गीतों की भाषा में सोचने लगते हैं। इससे समाज न सिर्फ विभाजित होता है बल्कि लोगों के बीच प्रतिद्विंदी वाली भावना भी पनपने लगती है। समस्या केवल इन जातिगत गानों को बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को इन्हें स्वीकारना इससे भी खतरनाक है। जब जाति आधारित गानों को लाखों व्यूज मिलते हैं, जब उन्हें रील्स में बार-बार इस्तेमाल किया जाता है और जब आम लोग इन्हें जोश के नाम पर आगे बढाते हैं, तो यह दिखाता है कि जातिवाद सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं रहा बल्कि यह मनोरंजन का साधन बन चुका है। कई बार इन जातिगत गानों पर आपत्ति भी जताई गई है। नेहा सिंह राठौर, गुंजन सिंह, समर सिंह जैसे कलाकारों के खिलाफ जातिवादी या उकसावे वाले गानों को लेकर कानूनी शिकायत भी दर्ज हुई है। क्योंकि उनके गानों को जातिवाद-विशुद्ध (Casteist) पाया गया। लेकिन ये जातिगत गाने कार्रवाई तक सीमित नहीं है, इनका सोशल मीडिया दर्शकों में गहरा प्रभाव पड़ चुका है। यह वो कंटेन्ट है जो कहीं न कहीं से उभरकर सामने आ ही जाता है। जातिगत गीतों के प्रभाव से कैसे बचा जाए? जातिगत गीतों पर प्रतिबंध लगाना ही केवल इस समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि इसके प्रभाव से भी लोगों को बचाने की जरूरत है। सरकार को निश्चित रूप से ऐसे कन्टेंट पर नजर रखनी चाहिए और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को अधिक जिम्मेदार बनाना होगा ताकि जाति के प्रति उकसावे वाले गीत तेजी से फैल ही न सकें। लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी समाज में बैठे आम लोगों की है। जब तक लोग ऐसे गानों को मनोरंजन मानकर उन्हें व्यूज, लाइक्स और शेयर करते रहेंगे तब तक मनोरंजन के बड़े चेहरे और राजनीतिक दल जनता को जातिगत गीतों से निशाना बनाते रहेंगे। फिलहाल इसका निदान शिक्षा और जागरूकता है। समाज का नेतृत्व कर रहे लोगों को बैठक बुलानी चाहिए और इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों में संदेश फैलाना चाहिए कि जातिगत गीत कोई मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के लिए जहर है।   Click to listen highlighted text! कुर्मी के राज, भूमिहार राजा, पांडे जी, चले ला अहिरान के, गोली चलेला बबुआन के… बिहार को जाति नहीं, जातीय दंभ से डराते इन गानों से चाहिए मुक्ति ‘RJD के माल हई रे’ और ‘यादव का माल हई रे’ जैसे गाने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में खूब चर्चा में रहे। केवल यही नहीं राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण जाति पर भी ऐसे गाने बने हैं, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हैं। ऐसे गानों ने बिहार में जातिवाद फैलाने की कोशिश की, जिससे समाज में नफरत फैलती है। जाति के आधार पर दूसरों को नीचा दिखाने वाले ऐसे गाने समाज में भेदभाव को हवा देते हैं। खासकर चुनावों के समय सोशल मीडिया और लोक-कार्यक्रमों में ऐसे गानों का इस्तेमाल बढ़ जाता है। इससे चुनाव केवल जातिवाद के केंद्र में सिमटकर रह जाते हैं। इन जातिगत गानों से समाज को प्रभावित होने से बचाने की जरूरत है। कौन-कौन से जातिवादी गाने बनाए गए? बिहार में ऐसे कई गानें बने हैं, जिनसे केवल एक खास जाति को निशाना बनाया गया है। इनमें यादव, ब्राह्मणों, राजपूत, भूमिहार से लेकर सभी जाति के गाने बनाए गए हैं। ये गाने जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं। कुछ जातिवाद फैलाने वाले लोकप्रिय गाने हैं- ‘आरा में चले ला अहिरान के‘- जहाँ यादव जाति का ही प्रभुत्व दिखाया जाता है। ‘पांडे जी का बेटा हूँ‘ गाना ब्राह्मणों के लिए बनाया गया है। ‘गोली चलेला बबुआन के बारात में‘- ये गाना राजपूत जाति को लेकर बनाया गया है। ‘हमके मरदे चाहिले भूमिहार राजा जी‘- भूमिहार जाति को लेकर बनाया गया है। ‘न गले वाला दाल हिया रे, ई ता RJD के माल हई रे‘- ये गाना RJD के समर्थकों और यादव जाति को टारगेट कर बनाया है। ‘कुर्मी के राज चलि‘- ये गाना कुर्मी समाज को टारगेट कर बनाया गया है। जातिगत गीत प्रचलित होने की वजह क्या है? ऐसे जातिगत गाने प्रचलित भी जल्दी हो जाते हैं। इनकी वजह है बिहार का डीजे कल्चर, खासकर शादी-ब्याह, जुलूस और चुनावी रैलियों में बजने वाले गानों का प्रभाव बेहद व्यापक होता है। जब ऐसे अवसरों पर जातिगत गाने तेज आवाज में बजाए जाते हैं तो वे सुनने वालों के दिमाग में अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी के लिए ‘नीचा’ वाला भाव जागृत करते हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दलों के समर्थक ऐसे गानों की रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाकर शेयर करते हैं ताकि अपनी जाति के मतदाताओं पर प्रभाव छोड़ सकें। ये वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स जैसे प्लैटफॉर्म पर जल्दी वायरल होते हैं और वोटरों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। वहीं शादी समारोह जैसे सार्वजनिक अवसरों पर ये गाने डीजे या चलती धुन के रूप में बजाए जाते हैं। इन्हें लोकल सिंगर्स और स्टेज आर्टिस्ट गाते हैं, जिन्हें गानों में जातिगत संदर्भ जोड़ने का फायदा होता है क्योंकि इससे उनकी लोकप्रियता और पहचान बढ़ती है। इससे भी अधिक चुनावी माहौल में इन गानों का गहरा असर आम जनता पर पड़ता है। चुनावी माहौल में राजनीतिक दल इन जातिगत गानों से जाति के आधार पर अपने मतदाताओं को आकर्षित करते हैं। ये सब ‘जाति-आधारित संदेश’ फैलाने से शुरू होता है, जो समाज में जहर बनकर सामने आता है। जातिगत गीतों से समाज में क्या समस्या हो रही है? सोशल मीडिया के जमाने में इन जातिगत गानों का चलन बढ़ता जा रहा है। शॉर्ट वीडियो की ‘डोज’ के साथ ये गाने लाखों लोगों के बीच वायरल हो जाते हैं। और जिन जाति के गाने होते हैं, वे एक-दूसरे के खिलाफ नफरत पर उतर पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि एक पढ़ा-लिखा सामान्य युवक और स्कूली बच्चे तक इन गीतों की भाषा में सोचने लगते हैं। इससे समाज न सिर्फ विभाजित होता है बल्कि लोगों के बीच प्रतिद्विंदी वाली भावना भी पनपने लगती है। समस्या केवल इन जातिगत गानों को बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को इन्हें स्वीकारना इससे भी खतरनाक है। जब जाति आधारित गानों को लाखों व्यूज मिलते हैं, जब उन्हें रील्स में बार-बार इस्तेमाल किया जाता है और जब आम लोग इन्हें जोश के नाम पर आगे बढाते हैं, तो यह दिखाता है कि जातिवाद सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं रहा बल्कि यह मनोरंजन का साधन बन चुका है। कई बार इन जातिगत गानों पर आपत्ति भी जताई गई है। नेहा सिंह राठौर, गुंजन सिंह, समर सिंह जैसे कलाकारों के खिलाफ जातिवादी या उकसावे वाले गानों को लेकर कानूनी शिकायत भी दर्ज हुई है। क्योंकि उनके गानों को जातिवाद-विशुद्ध (Casteist) पाया गया। लेकिन ये जातिगत गाने कार्रवाई तक सीमित नहीं है, इनका सोशल मीडिया दर्शकों में गहरा प्रभाव पड़ चुका है। यह वो कंटेन्ट है जो कहीं न कहीं से उभरकर सामने आ ही जाता है। जातिगत गीतों के प्रभाव से कैसे बचा जाए? जातिगत गीतों पर प्रतिबंध लगाना ही केवल इस समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि इसके प्रभाव से भी लोगों को बचाने की जरूरत है। सरकार को निश्चित रूप से ऐसे कन्टेंट पर नजर रखनी चाहिए और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को अधिक जिम्मेदार बनाना होगा ताकि जाति के प्रति उकसावे वाले गीत तेजी से फैल ही न सकें। लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी समाज में बैठे आम लोगों की है। जब तक लोग ऐसे गानों को मनोरंजन मानकर उन्हें व्यूज, लाइक्स और शेयर करते रहेंगे तब तक मनोरंजन के बड़े चेहरे और राजनीतिक दल जनता को जातिगत गीतों से निशाना बनाते रहेंगे। फिलहाल इसका निदान शिक्षा और जागरूकता है। समाज का नेतृत्व कर रहे लोगों को बैठक बुलानी चाहिए और इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों में संदेश फैलाना चाहिए कि जातिगत गीत कोई मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के लिए जहर है।

कुर्मी के राज, भूमिहार राजा, पांडे जी, चले ला अहिरान के, गोली चलेला बबुआन के… बिहार को जाति नहीं, जातीय दंभ से डराते इन गानों से चाहिए मुक्ति

‘RJD के माल हई रे’ और ‘यादव का माल हई रे’ जैसे गाने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में खूब चर्चा में रहे। केवल यही नहीं राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण जाति पर भी ऐसे गाने बने हैं, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हैं। ऐसे गानों ने बिहार में जातिवाद फैलाने की कोशिश की, जिससे समाज में नफरत फैलती है।

जाति के आधार पर दूसरों को नीचा दिखाने वाले ऐसे गाने समाज में भेदभाव को हवा देते हैं। खासकर चुनावों के समय सोशल मीडिया और लोक-कार्यक्रमों में ऐसे गानों का इस्तेमाल बढ़ जाता है। इससे चुनाव केवल जातिवाद के केंद्र में सिमटकर रह जाते हैं। इन जातिगत गानों से समाज को प्रभावित होने से बचाने की जरूरत है।

कौन-कौन से जातिवादी गाने बनाए गए?

बिहार में ऐसे कई गानें बने हैं, जिनसे केवल एक खास जाति को निशाना बनाया गया है। इनमें यादव, ब्राह्मणों, राजपूत, भूमिहार से लेकर सभी जाति के गाने बनाए गए हैं। ये गाने जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं। कुछ जातिवाद फैलाने वाले लोकप्रिय गाने हैं-

‘आरा में चले ला अहिरान के‘- जहाँ यादव जाति का ही प्रभुत्व दिखाया जाता है।

‘पांडे जी का बेटा हूँ‘ गाना ब्राह्मणों के लिए बनाया गया है।

‘गोली चलेला बबुआन के बारात में‘- ये गाना राजपूत जाति को लेकर बनाया गया है।

‘हमके मरदे चाहिले भूमिहार राजा जी‘- भूमिहार जाति को लेकर बनाया गया है।

‘न गले वाला दाल हिया रे, ई ता RJD के माल हई रे‘- ये गाना RJD के समर्थकों और यादव जाति को टारगेट कर बनाया है।

‘कुर्मी के राज चलि‘- ये गाना कुर्मी समाज को टारगेट कर बनाया गया है।

जातिगत गीत प्रचलित होने की वजह क्या है?

ऐसे जातिगत गाने प्रचलित भी जल्दी हो जाते हैं। इनकी वजह है बिहार का डीजे कल्चर, खासकर शादी-ब्याह, जुलूस और चुनावी रैलियों में बजने वाले गानों का प्रभाव बेहद व्यापक होता है। जब ऐसे अवसरों पर जातिगत गाने तेज आवाज में बजाए जाते हैं तो वे सुनने वालों के दिमाग में अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी के लिए ‘नीचा’ वाला भाव जागृत करते हैं।

चुनाव के समय राजनीतिक दलों के समर्थक ऐसे गानों की रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाकर शेयर करते हैं ताकि अपनी जाति के मतदाताओं पर प्रभाव छोड़ सकें। ये वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स जैसे प्लैटफॉर्म पर जल्दी वायरल होते हैं और वोटरों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं।

वहीं शादी समारोह जैसे सार्वजनिक अवसरों पर ये गाने डीजे या चलती धुन के रूप में बजाए जाते हैं। इन्हें लोकल सिंगर्स और स्टेज आर्टिस्ट गाते हैं, जिन्हें गानों में जातिगत संदर्भ जोड़ने का फायदा होता है क्योंकि इससे उनकी लोकप्रियता और पहचान बढ़ती है।

इससे भी अधिक चुनावी माहौल में इन गानों का गहरा असर आम जनता पर पड़ता है। चुनावी माहौल में राजनीतिक दल इन जातिगत गानों से जाति के आधार पर अपने मतदाताओं को आकर्षित करते हैं। ये सब ‘जाति-आधारित संदेश’ फैलाने से शुरू होता है, जो समाज में जहर बनकर सामने आता है।

जातिगत गीतों से समाज में क्या समस्या हो रही है?

सोशल मीडिया के जमाने में इन जातिगत गानों का चलन बढ़ता जा रहा है। शॉर्ट वीडियो की ‘डोज’ के साथ ये गाने लाखों लोगों के बीच वायरल हो जाते हैं। और जिन जाति के गाने होते हैं, वे एक-दूसरे के खिलाफ नफरत पर उतर पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि एक पढ़ा-लिखा सामान्य युवक और स्कूली बच्चे तक इन गीतों की भाषा में सोचने लगते हैं। इससे समाज न सिर्फ विभाजित होता है बल्कि लोगों के बीच प्रतिद्विंदी वाली भावना भी पनपने लगती है।

समस्या केवल इन जातिगत गानों को बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को इन्हें स्वीकारना इससे भी खतरनाक है। जब जाति आधारित गानों को लाखों व्यूज मिलते हैं, जब उन्हें रील्स में बार-बार इस्तेमाल किया जाता है और जब आम लोग इन्हें जोश के नाम पर आगे बढाते हैं, तो यह दिखाता है कि जातिवाद सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं रहा बल्कि यह मनोरंजन का साधन बन चुका है।

कई बार इन जातिगत गानों पर आपत्ति भी जताई गई है। नेहा सिंह राठौर, गुंजन सिंह, समर सिंह जैसे कलाकारों के खिलाफ जातिवादी या उकसावे वाले गानों को लेकर कानूनी शिकायत भी दर्ज हुई है। क्योंकि उनके गानों को जातिवाद-विशुद्ध (Casteist) पाया गया। लेकिन ये जातिगत गाने कार्रवाई तक सीमित नहीं है, इनका सोशल मीडिया दर्शकों में गहरा प्रभाव पड़ चुका है। यह वो कंटेन्ट है जो कहीं न कहीं से उभरकर सामने आ ही जाता है।

जातिगत गीतों के प्रभाव से कैसे बचा जाए?

जातिगत गीतों पर प्रतिबंध लगाना ही केवल इस समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि इसके प्रभाव से भी लोगों को बचाने की जरूरत है। सरकार को निश्चित रूप से ऐसे कन्टेंट पर नजर रखनी चाहिए और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को अधिक जिम्मेदार बनाना होगा ताकि जाति के प्रति उकसावे वाले गीत तेजी से फैल ही न सकें।

लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी समाज में बैठे आम लोगों की है। जब तक लोग ऐसे गानों को मनोरंजन मानकर उन्हें व्यूज, लाइक्स और शेयर करते रहेंगे तब तक मनोरंजन के बड़े चेहरे और राजनीतिक दल जनता को जातिगत गीतों से निशाना बनाते रहेंगे।

फिलहाल इसका निदान शिक्षा और जागरूकता है। समाज का नेतृत्व कर रहे लोगों को बैठक बुलानी चाहिए और इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों में संदेश फैलाना चाहिए कि जातिगत गीत कोई मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के लिए जहर है।

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