एक कहावत है, ‘चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से न जाए’ यानी बुरी आदतों को कितना ही दबा-छिपा लिया जाए लेकिन वो बार-बार सामने आ ही जाती हैं। कॉन्ग्रेस से जुड़े इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा चिली की पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बैश्लेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार’ देने का फैसला इसी कहावत को चरितार्थ करता दिखता है।
कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बुधवार (19 नवंबर 2025) को उन्हें खुद यह पुरस्कार दिया। इस दौरान सोनिया गाँधी ने मिशेल बैश्लेट के ‘विश्व शांति’ के लिए किए गए कामों को भी याद किया है। सोनिया ने उनकी तारीफ में खूब कशीदे पढ़े और देश को नया रूप देने के लिए उनकी जमकर तारीफ भी की। हालाँकि, असल कहानी इससे आगे है।
बैश्लेट को सोनिया बेशक दुनिया की शांति का मसीहा बना रहे हो लेकिन भारत के लिए उनकी सोच हमेशा से विरोधियों वाली ही रही है। चिली के लिए बेशक उन्होंने कुछ भी किया हो लेकिन भारत की छवि को वैश्विक पटल पर खराब करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब पश्चिमी जगत और चीन की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले राहुल गाँधी को हो सकता है कि भारत विरोधी मानसिकता वाली बैश्लेट में ही क्रांति का मसीहा नजर आ रहा हो।
जम्मू-कश्मीर पर विवादित टिप्पणियाँ
बैश्लेट ने जम्मू-कश्मीर के बहाने भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा, उन्होंने खूब कोशिश की कि किसी भी तरह भारत को दुनिया के सामने एक तानाशाह देश के रुप में पेश किया जा सके।
सितंबर 2020 में मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए उन्होंने भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा था, “भारत के कब्जे वाले कश्मीर में आम लोगों के खिलाफ मिलिट्री और पुलिस की हिंसा की घटनाएँ जारी हैं, जिसमें पेलेट गन का इस्तेमाल और मिलिटेंसी से जुड़ी घटनाएँ शामिल हैं। पॉलिटिकल बहस और पब्लिक पार्टिसिपेशन की जगह बहुत कम हो गई है।”
जिस भारत अनुच्छेद 370 जैसा बड़ा फैसला लेने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में हिंसा नहीं होने दी, उसे लेकर इस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी करना जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा था।
सितंबर 2021 में एक बार फिर बैश्लेट ने भारत विरोधी मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा, “जम्मू और कश्मीर में आम सभाओं पर अधिकारियों की रोक और समय-समय पर कम्युनिकेशन ब्लैकआउट जारी हैं जबकि सैकड़ों लोग अपनी बात कहने की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में हैं। पत्रकारों पर दबाव है और UAPA का गलत इस्तेमाल हो रहा है।” भारत ने तब भी बैश्लेट के इस प्रोपेगेंडा की जमकर आलोचना की थी।
बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार के चैंपियन असल में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने से तड़प रहे थे और चाहते थे कि किसी भी तरह यह साबित किया जा सके कि भारत अपने राज्यों को नहीं संभाल पा रहा है। हालाँकि, उनकी यह मेहनत रंग नहीं लाई और भारत ने पूरी मजबूती के साथ जम्मू-कश्मीर को मुख्यधारा के साथ पूरी तरह से जोड़ने का काम कर दिखाया।
FCRA पर अलापा अपना राग
भारत ने जब देश में एमनेस्टी इंटरनैशनल पर विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की तो बैश्लेट को इसमें भी दिक्कतें नजर आई थीं। उन्होंने FCRA को ही गड़बड़ बता दिया। यानी उन्होंने भारत को ये नसीहत देने की कोशिश की कि उन्हें किस तरह अपने नियम बनाने चाहिए। भारत के आंतरिक मामलों में मानवाधिकार प्रमुख का दखल देना क्या खुद में एक बड़ा सवाल नहीं है?
भारत ने बैश्लेट की बयानबाजी को खारिज कर दिया और बताया कि भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारत ने जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए कहा, “कानून बनाने का अधिकार हमारा अपना है और मानवाधिकारों के नाम पर कानून के उल्लंघन को माफ नहीं किया जा सकता।”
CAA के खिलाफ कोर्ट में दी थी याचिका
भारत ने पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) लाई लेकिन इसके खिलाफ देशभर में खूब प्रदर्शन हुए। लोगों को झूठ फैलाकर खूब बरगलाया गया कि भारत में मुस्लिमों की नागिरकता इससे छिन जाएगी। लोगों को बरगाने वालों में बैश्लेट जैसे लोग शामिल थे।
मार्च 2020 में बैश्लेट ने अपने अधिकारियों के जरिए CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक डलवा दी थी। यह बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की देश के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश ही थी। भारत ने तब भी बैश्लेट पर कड़ा पलटवार किया था। भारत ने कहा था, “CAA भारत का आंतरिक मामला है और भारतीय संसद के कानून बनाने के संप्रभु अधिकार से संबंधित है। हमारा विश्वास है कि भारत की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी विदेशी पक्ष का कोई अधिकार नहीं है।”
किसान आंदोलन के दौरान भी आग में डाला घी
बैश्लेट ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान भी आग में घी डालने का काम किया था। आंदोलन को भड़काने की कोशिश के दौरान जब कथित एक्टिविस्ट के खिलाफ कार्रवाई हुई तो बैश्लेट ने भी अपने प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया था। बैश्लेट ने भारत की कार्रवाई को मानवाधिकार के सिद्धांतों के खिलाफ बताया था।
किसान आंदोलन की आड़ में जब 26 जनवरी पर हिंसा की कोशिश की जा रही थी, किसान आंदोलन की आड़ में कुछ दंगाई देश को हिंसा की आग में झोंकना चाहते थे और भारत ने उस पर कार्रवाई की तो बैश्लेट जैसे लोगों को दर्द शुरू हो गया। भारत ने तब भी उनकी कड़ी आलोचना की थी।
मुस्लिमों पर हमले को लेकर फैलाया अंतर्राष्ट्रीय प्रोपेगेंडा
दुनिया का एक वर्ग में मुस्लिमों का हितेषी बनने और उन्हें भारत में पीड़ित दिखाने की चाह में मुस्लिमों पर कथित आक्रमण का एक झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है। ना केवल मुस्लिमों बल्कि बैश्लेट ने तो एक कदम आगे जाकर दलित और आदिवासियों पर हमलों का भी आरोप भारत में लगाया था।
बैश्लेट के ऐसे इन सबके अलावा भी कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे। साफ है कि बैश्लेट का विरोध सराकर या संस्था से आगे बढ़कर भारत को निशाने पर लेने के लिए था। चूँकि यही सब मुद्दे या इनसे जुड़े मुद्दे ही कॉन्ग्रेस को भी भाते हैं तो उन्होंने बैश्लेट में अपना नया दोस्त नजर आया होगा।
कॉन्ग्रेस का ‘देश विरोधियों’ से प्यार क्यों नही होता खत्म?
भारत विरोधी मानसिकता रखने वाली मिशेल बैश्लेट के साथ कॉन्ग्रेस का इस तरह खुलकर खड़ा होना केवल एक संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग जैसा लगता है। कॉन्ग्रेस के लिए बैश्लेट कोई मानवाधिकारों की मसीहा नहीं हैं बल्कि वह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय चेहरा हैं जिनकी भारत-विरोधी टिप्पणियाँ मोदी सरकार को घेरने के लिए बार-बार इस्तेमाल की जाती रही हैं।
बैश्लेट को मंच देने का अर्थ यह भी है कि कॉन्ग्रेस अपनी राजनीतिक लड़ाई के लिए उन अंतरराष्ट्रीय आवाजों पर भरोसा करती है जिन्हें भारत विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। कॉन्ग्रेस जिस बैश्लेट को शांति और निरस्त्रीकरण का सम्मान दे रही है, वही बैश्लेट भारत के आंतरिक और संवेदनशील मुद्दों को लेकर हमेशा एकतरफा टिप्पणियाँ करती रही हैं।
दिलचस्प यह है कि उनकी हर टिप्पणी ठीक उसी वक्त आई जब कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दल मोदी सरकार पर हमला कर रहे थे। चाहे अनुच्छेद 370 हटाने की बात हो, CAA का विरोध हो या किसान आंदोलन की आग को भड़काने का दौर, मौके पर बैश्लेट ने वही कहा जो भारत के विपक्षी दल अंतरराष्ट्रीय मंचों से सुनना चाहते थे। जब कॉन्ग्रेस उन्हें सम्मानित करती है, तो उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि मोदी सरकार की नीतियों और भारत पर हमला करने वालों को पुरस्कार देने जैसा लगता है।
यह वही राजनीति है जिसमें देश की छवि से बढ़कर अपना ‘नैरेटिव’ दिखाई देता है। असल बात यह है कि कॉन्ग्रेस को बैश्लेट में वह ‘आवाज’ दिखती है जो उनकी विचारधारा के अनुरूप भारत को कमजोर, विभाजित और हमेशा लड़ता हुआ दिखाने की कोशिश करती है।
बैश्लेट की टिप्पणी, चाहे वे कितनी भी झूठी या आधी-अधूरी क्यों न हों, वो कॉन्ग्रेस के नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान करती हैं। इसलिए उनका प्यार बैश्लेट जैसे भारत विरोधियों से कभी कम नहीं होता है।


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