
बिहार चुनाव में जनसुराज पूरी दमखम के साथ चुनावी रण में उतरी। प्रशांत किशोर ने 238 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, यह पहली बार चुनाव लड़ रही पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक हैं। हालाँकि, यह चुनाव परिणामों में साबित भी हो गया। जनसुराज एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीती। पार्टी के अधिकतर उम्मीदवार तीसरे या तो चौथे स्थान पर लटके रहे। सिर्फ एक उम्मीदवार दूसरे स्थान तक पहुँचा।
जनसुराज की हालत इतनी बुरी रही कि पार्टी को केवल 2 से 3 प्रतिशत ही वोट शेयर हासिल हुआ, जिसका जीतने वाले NDA से तुलना भी नहीं की जा सकती है। यह वोट शेयर कुछ छोटे दलों की तुलना में भी काफी कम है। पार्टी के 68 सीटों पर तो वोट इतने कम थे कि वे NOTA से भी पिछड़ गए।
इसके अलावा सबसे बड़ी मात में जनसुराज के कुल 238 उम्मीदवारों में से 236 की तो जमानत तक जब्त हो गई। यानी लगभग 99.16 प्रतिशत अपनी जमानत बचाने में असफल रहे। इनमें अधिकतर उम्मीदवार तीसरे, चौथे या उससे भी नीचे स्थान पर रहे और कुल मिलाकर पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। लेकिन पूरे प्रदेश में कुल मिलाकर पार्टी को 15 लाख वोट मिले।
वहीं जनसुराज के स्टार उम्मीदवारों की बात करें तो चनपटिया विधानसभा से यूट्यूबर मनीष कश्यप को 37172 वोट मिले। इस सीट पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवार ने 602 वोट से जीत दर्ज की। कुम्हरार सीट से केसी सिन्हा को कुल 15,017 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे। इस सीट पर बीजेपी के संजय कुमार ने 1,48,500 से ज्यादा वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की। दरभंगा से पूर्व DGP आर मिश्रा और काराकाट से गायक रितेश पांडे जैसे चर्चित नाम भी चुनाव में उतरे लेकिन ये लोग भी जीत से दूर रहे।
जनसुराज ने महागठबंधन और NDA पर डाला असर?
इससे जाहिर है कि जनसुराज का प्रदर्शन बिहार चुनाव में बेहद खराब रहा। इस बीच कुछ मीडिया संस्थान और सोशल मीडिया पर खबरें तेज हैं कि बिहार चुनाव में जनसुराज ने NDA और महागठबंधन के वोट प्रभावित किए हैं। दावा किया गया कि चुनाव में जनसुराज ने NDA को लाभ और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया है।
ABP Live के सर्वे और रिपोर्ट में यह बताया गया कि जनसुराज की पकड़ कम होने के बावजूद, महागठबंधन की सीटें कम होने और NDA की बढ़त के पीछे जनसुराज के प्रभाव को एक कारण माना गया। खासकर, उन इलाकों में जहाँ NDA को चुनाव में भारी जीत मिल सकी।
यहाँ चर्चा जनसुराज की उन 35 सीटों की हो रही है, जिनपर उन्हें हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले। इन सीटों में 19 सीटें NDA के खाते में गईं, जबकि 14 सीटें महागठबंधन के खाते में आईं और बाकी एक-एक ओवैसी की पार्टी AIMIM और BSP की झोली में गईं।
जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल
मीडिया में सामने आया जनसुराज का यह सच अधूरा है। आइए आँकड़ों के अनुसार जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल जानते हैं, जिनपर NDA को फायदा और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाने का विश्लेषण पेश किया जा रहा है।
इनमें जनसुराज के स्टार उम्मीदवार मनीष कश्यप की विधानसभा चनपटिया भी शामिल है। इस सीट पर कॉन्ग्रेस के अभिषेक रंजन ने 602 वोटों से जीत दर्ज की। उधर, मनीष कश्यप को 50,366 वोट प्राप्त कर तीसरा स्थान हासिल हुआ। बीजेपी उम्मीदवार 86,936 वोट से दूसरे स्थान पर रहे।
फोटो साभार: ECI
एक और विधानसभा फोर्ब्सगंज की बात करें तो जनसुराज उम्मीदवार 977 वोट के साथ छठे स्थान पर रहे। वहीं जीतने वाली कॉन्ग्रेस ने बीजेपी को 221 वोट से हराया। सन्देश सीट पर भी तीसरे स्थान पर रहे जनसुराज उम्मीदवार को 6040 वोट मिले। जबकि जीतने वाली NDA के घटक दल JDU उम्मीदवार ने RJD को केवल 27 वोटों से मात दी।
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इन्हीं 35 सीटों में एक सीट AIMIM के खाते में भी पहुँची है। इस जोकीहाट विधानसभा के आँकड़ों के अनुसार, जनसुराज को 35,354 वोट मिले हैं। जबकि AIMIM उम्मीदवार की जीत का मार्जिन 28,803 वोट है।
वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) के खाते में पहुँची रामगढ़ विधानसभा सीट में प्रत्याशी सतीश कुमार ने केवल 30 वोटों से जीत हासिल की है। वहीं जनसुराज को 4,426 वोट मिले हैं, जिसका हार-जीत के वोट के अंतर से कोई लेना-देना नहीं है।
फोटो साभार: ECI
इन आँकड़ों से यह तो साफ हो गया कि इन सीटों पर जनसुराज का कोई असर नहीं दिखा है। जहाँ जीतने वाले दलों की जीत का अंतर जनसुराज को मिले वोट से कहीं कम है।
जनसुराज से महागठबंधन को नुकसान और NDA को पहुँचा लाभ?
इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जनसुराज की मौजूदगी से केवल NDA विरोधी या महागठबंधन विरोधी होने का पता नहीं चलता है। जिस तरह के आँकड़े सामने आए हैं, वे यह नहीं दिखाते कि जनसुराज की वजह से महागठबंधन को नुकसान पहुँचा है या NDA को फायदा हुआ हो।
बल्कि जनसुराज के प्रभाव से NDA के भी वोट कटे है और अन्य दलों ने भी उसका असर झेला है। इन 35 सीटों के नतीजों को ही देखें तो कहीं भी ऐसा साफ-साफ नहीं दिखता कि जनसुराज की एंट्री से महागठबंधन को एकतरफा नुकसान हुआ हो और NDA को उतना ही बड़ा फायदा मिला हो। कुछ सीटों पर हालात उल्टे भी हुए हैं। कहीं जनसुराज का वोट NDA के हिस्से को काटता दिखता है तो कहीं महागठबंधन का वोट।
यानी राजनीतिक समीकरण सीट-दर-सीट बदलते रहे हैं। इससे पता लगता है कि जनसुराज का प्रभाव एकतरफा नहीं बल्कि मिश्रित है। उसका असर किसे कितना पड़ा, यह हर सीट की स्थानीय राजनीति और वहाँ के उम्मीदवारों की स्थिति पर निर्भर करता है।

