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2020 में अंकुरित हुआ था जो वामपंथी विष बेल, उसे 5 साल में ही बिहार ने फिर से किया दफन बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई दूरगामी राजनीतिक संदेश देने वाला रहा है। सत्तारूढ़ NDA को मिले स्पष्ट बहुमत ने जहाँ एक और दिखाया कि मतदाता अभी भी नीतीश कुमार की साफ छवि और विकासवादी राजनीति के साथ खड़े हैं। वहीं, RJD के खराब प्रदर्शन ने दिखाया कि उनका कोर वोट बैंक MY (मुस्लिम-यादव) भी उनसे छिटक रहा है। AIMIM को मिली 5 सीटों से उनके मुस्लिम बहुल इलाकों में पैठ बनाने की पुष्टि हुई तो बिहार ने एक बार फिर वामपंथ की ‘विषैली राजनीति’ को नकार दिया। गुणा-गणित से 3 सीटों तक पहुँचीं लेफ्ट पार्टियाँ इस विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) को जहाँ 2 सीटें मिलीं तो वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के हाथ केवल एक सीट लगी। इन तीनों सीटों पर भी लेफ्ट के विचार से ज्यादा असर निर्दलीय उम्मीदवारों के गुणा-गणित का दिखाई पड़ा। काराकाट सीट पर CPI (ML) (L) को 2,836 वोटों से जीत मिली तो इस सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहीं भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह को 23,469 वोट मिले। कमोबेश यही स्थिति लेफ्ट को मिली अन्य 2 सीटों पर दिखाई पड़ी। यानी अगर सीधा मुकाबला होता तो शायद लेफ्ट के हाथ ये सीटें भी ना आतीं। जब बिहार ने RJD को किया था खारिज दिलचस्प यह है कि यह पहली बार नहीं है जब वामपंथी दलों या RJD को बिहार ने इस तरह से नकारा हो। 2010 में RJD की ऐतिहासिक हार के बाद माना गया कि बिहार ने जंगलराज को प्रश्रय देने वाली पार्टी को जमीदोज कर दिया था। उसके उस स्मृति से हमेशा के लिए दूरी बना ली है जो उसके पिछड़ेपन का प्रतीक बनी हुई थी। नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल ने उस जनमत को और मजबूत किया। RJD को उस चुनाव में केवल 22 सीटें मिली थीं। 2010 बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम (साभार: ECI) हालाँकि, 2015 आते-आते नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रयोगों के कारण RJD फिर जिंदा दिखाई देने लगी और उसकी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में वापसी हो गई। इसके अगले चुनाव में भी हालात RJD के अनूकुल दिखाई दिए लेकिन उसके पीछे की बड़ी वजह चिराग पासवान थे। चिराग पासवान 2020 के चुनावों के दौरान नीतीश कुमार से नाराज थे और उनकी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे। इसके कारण RJD को मदद मिली और पार्टी एक बार फिर ताकतवार बनकर वापस लौटी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस-RJD की जीत फिर भी इतनी बड़ी नहीं थी कि उन्हें सत्ता दिला पाती। इसी चुनाव में वामपंथी दलों ने भी वापसी की थी। 2020 के चुनावों में CPI (ML) (L) को 12 तो CPI और CPI (M) को 2-2 सीटें मिलीं। यानी लंबे वक्त पहले जिस वामपंथ को बिहार ने खारिज कर दिया था वो 16 सीटों के साथ उसके फिर से वापसी करने की अटकलें लगने लगी थीं। 2015-2020 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे (फोटो: PRS India) 2024 में लोकसभा चुनावों में भी CPI (ML) (L) ने बिहार में 2 सीटों पर जीत दर्ज की और लगने लगा की लेफ्ट की पार्टियाँ बिहार में एक बार फिर दम दिखा रही हैं। CPI-ML ने यह संकेत दिया कि बिहार के कुछ हिस्सों में उसकी जमीन अब भी सुरक्षित है। 2024 बिहार लोकसभा चुनाव परिणाम (ECI) चिराग द्वारा दी गई ऑक्सीजन जब इस वार वामपंथियों और RJD से हटी तो उन्हें अपनी असलियत दिख गई। बिहार की जनता से RJD और वामंपथी दलों की एक बार फिर से सूपड़ा साफ कर दिया। जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपना विश्वास और पुख्ता किया है। जिस तरह से एकजुट होकर NDA ने चुनाव लड़ा उससे अगर वोटरों के मन में कोई शंका थी भी तो वो भी दूर हो गई। जनता ने स्पष्ट और एक तरफा मत दिया, वोटों की इस सुनामी में वामपंथी दल साफ हो गए। फिर से ना पनपे ‘विष बेल’: अब NDA की जिम्मेदारी अब NDA के सामने भी चुनौती है कि वो इस जनादेश का सम्मान करे। जनता ने उसे सिर्फ ‘विकल्प’ नहीं बनाया है बल्कि पूर्ण ‘विश्वास’ भी दिया है। यह विश्वास इस बात पर आधारित है कि NDA बिहार को उन पुराने दौरों में वापस नहीं ले जाएगा जिनमें वामपंथी उग्रवाद, जातीय हिंसा, आपराधिक राजनीति और संस्थागत दुर्बलता हावी रहती थी। NDA को भी यह समझना होगा कि आगे वो ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयोग से बचें जिससे वामपंथी दलों को फिर से ताकत मिल सके। यह जनमत अतीत को दफन करने का विश्वासमत है। यह जनमत दिखाता है कि बिहार के लोग अपने सुरक्षित भविष्य के लिए NDA पर भरोसा कर रहे हैं। PM मोदी और नीतीश कुमार पर भरोसा कर रहे हैं। जनता ने स्थिरता और विकास के नाम पर फैसला सुनाया है। यह फैसला सिर्फ NDA के पक्ष में नहीं है बल्कि यह फैसला उस बिहार के पक्ष में है जो आगे बढ़ना चाहता है, जो अपने युवा को अवसर देना चाहता है और जो किसी भी कीमत पर अराजकता के दौर में वापसी नहीं चाहता।   Click to listen highlighted text! 2020 में अंकुरित हुआ था जो वामपंथी विष बेल, उसे 5 साल में ही बिहार ने फिर से किया दफन बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई दूरगामी राजनीतिक संदेश देने वाला रहा है। सत्तारूढ़ NDA को मिले स्पष्ट बहुमत ने जहाँ एक और दिखाया कि मतदाता अभी भी नीतीश कुमार की साफ छवि और विकासवादी राजनीति के साथ खड़े हैं। वहीं, RJD के खराब प्रदर्शन ने दिखाया कि उनका कोर वोट बैंक MY (मुस्लिम-यादव) भी उनसे छिटक रहा है। AIMIM को मिली 5 सीटों से उनके मुस्लिम बहुल इलाकों में पैठ बनाने की पुष्टि हुई तो बिहार ने एक बार फिर वामपंथ की ‘विषैली राजनीति’ को नकार दिया। गुणा-गणित से 3 सीटों तक पहुँचीं लेफ्ट पार्टियाँ इस विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) को जहाँ 2 सीटें मिलीं तो वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के हाथ केवल एक सीट लगी। इन तीनों सीटों पर भी लेफ्ट के विचार से ज्यादा असर निर्दलीय उम्मीदवारों के गुणा-गणित का दिखाई पड़ा। काराकाट सीट पर CPI (ML) (L) को 2,836 वोटों से जीत मिली तो इस सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहीं भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह को 23,469 वोट मिले। कमोबेश यही स्थिति लेफ्ट को मिली अन्य 2 सीटों पर दिखाई पड़ी। यानी अगर सीधा मुकाबला होता तो शायद लेफ्ट के हाथ ये सीटें भी ना आतीं। जब बिहार ने RJD को किया था खारिज दिलचस्प यह है कि यह पहली बार नहीं है जब वामपंथी दलों या RJD को बिहार ने इस तरह से नकारा हो। 2010 में RJD की ऐतिहासिक हार के बाद माना गया कि बिहार ने जंगलराज को प्रश्रय देने वाली पार्टी को जमीदोज कर दिया था। उसके उस स्मृति से हमेशा के लिए दूरी बना ली है जो उसके पिछड़ेपन का प्रतीक बनी हुई थी। नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल ने उस जनमत को और मजबूत किया। RJD को उस चुनाव में केवल 22 सीटें मिली थीं। 2010 बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम (साभार: ECI) हालाँकि, 2015 आते-आते नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रयोगों के कारण RJD फिर जिंदा दिखाई देने लगी और उसकी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में वापसी हो गई। इसके अगले चुनाव में भी हालात RJD के अनूकुल दिखाई दिए लेकिन उसके पीछे की बड़ी वजह चिराग पासवान थे। चिराग पासवान 2020 के चुनावों के दौरान नीतीश कुमार से नाराज थे और उनकी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे। इसके कारण RJD को मदद मिली और पार्टी एक बार फिर ताकतवार बनकर वापस लौटी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस-RJD की जीत फिर भी इतनी बड़ी नहीं थी कि उन्हें सत्ता दिला पाती। इसी चुनाव में वामपंथी दलों ने भी वापसी की थी। 2020 के चुनावों में CPI (ML) (L) को 12 तो CPI और CPI (M) को 2-2 सीटें मिलीं। यानी लंबे वक्त पहले जिस वामपंथ को बिहार ने खारिज कर दिया था वो 16 सीटों के साथ उसके फिर से वापसी करने की अटकलें लगने लगी थीं। 2015-2020 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे (फोटो: PRS India) 2024 में लोकसभा चुनावों में भी CPI (ML) (L) ने बिहार में 2 सीटों पर जीत दर्ज की और लगने लगा की लेफ्ट की पार्टियाँ बिहार में एक बार फिर दम दिखा रही हैं। CPI-ML ने यह संकेत दिया कि बिहार के कुछ हिस्सों में उसकी जमीन अब भी सुरक्षित है। 2024 बिहार लोकसभा चुनाव परिणाम (ECI) चिराग द्वारा दी गई ऑक्सीजन जब इस वार वामपंथियों और RJD से हटी तो उन्हें अपनी असलियत दिख गई। बिहार की जनता से RJD और वामंपथी दलों की एक बार फिर से सूपड़ा साफ कर दिया। जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपना विश्वास और पुख्ता किया है। जिस तरह से एकजुट होकर NDA ने चुनाव लड़ा उससे अगर वोटरों के मन में कोई शंका थी भी तो वो भी दूर हो गई। जनता ने स्पष्ट और एक तरफा मत दिया, वोटों की इस सुनामी में वामपंथी दल साफ हो गए। फिर से ना पनपे ‘विष बेल’: अब NDA की जिम्मेदारी अब NDA के सामने भी चुनौती है कि वो इस जनादेश का सम्मान करे। जनता ने उसे सिर्फ ‘विकल्प’ नहीं बनाया है बल्कि पूर्ण ‘विश्वास’ भी दिया है। यह विश्वास इस बात पर आधारित है कि NDA बिहार को उन पुराने दौरों में वापस नहीं ले जाएगा जिनमें वामपंथी उग्रवाद, जातीय हिंसा, आपराधिक राजनीति और संस्थागत दुर्बलता हावी रहती थी। NDA को भी यह समझना होगा कि आगे वो ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयोग से बचें जिससे वामपंथी दलों को फिर से ताकत मिल सके। यह जनमत अतीत को दफन करने का विश्वासमत है। यह जनमत दिखाता है कि बिहार के लोग अपने सुरक्षित भविष्य के लिए NDA पर भरोसा कर रहे हैं। PM मोदी और नीतीश कुमार पर भरोसा कर रहे हैं। जनता ने स्थिरता और विकास के नाम पर फैसला सुनाया है। यह फैसला सिर्फ NDA के पक्ष में नहीं है बल्कि यह फैसला उस बिहार के पक्ष में है जो आगे बढ़ना चाहता है, जो अपने युवा को अवसर देना चाहता है और जो किसी भी कीमत पर अराजकता के दौर में वापसी नहीं चाहता।

2020 में अंकुरित हुआ था जो वामपंथी विष बेल, उसे 5 साल में ही बिहार ने फिर से किया दफन

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई दूरगामी राजनीतिक संदेश देने वाला रहा है। सत्तारूढ़ NDA को मिले स्पष्ट बहुमत ने जहाँ एक और दिखाया कि मतदाता अभी भी नीतीश कुमार की साफ छवि और विकासवादी राजनीति के साथ खड़े हैं। वहीं, RJD के खराब प्रदर्शन ने दिखाया कि उनका कोर वोट बैंक MY (मुस्लिम-यादव) भी उनसे छिटक रहा है। AIMIM को मिली 5 सीटों से उनके मुस्लिम बहुल इलाकों में पैठ बनाने की पुष्टि हुई तो बिहार ने एक बार फिर वामपंथ की ‘विषैली राजनीति’ को नकार दिया।

गुणा-गणित से 3 सीटों तक पहुँचीं लेफ्ट पार्टियाँ

इस विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) को जहाँ 2 सीटें मिलीं तो वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट) के हाथ केवल एक सीट लगी। इन तीनों सीटों पर भी लेफ्ट के विचार से ज्यादा असर निर्दलीय उम्मीदवारों के गुणा-गणित का दिखाई पड़ा।

काराकाट सीट पर CPI (ML) (L) को 2,836 वोटों से जीत मिली तो इस सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहीं भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह को 23,469 वोट मिले। कमोबेश यही स्थिति लेफ्ट को मिली अन्य 2 सीटों पर दिखाई पड़ी। यानी अगर सीधा मुकाबला होता तो शायद लेफ्ट के हाथ ये सीटें भी ना आतीं।

जब बिहार ने RJD को किया था खारिज

दिलचस्प यह है कि यह पहली बार नहीं है जब वामपंथी दलों या RJD को बिहार ने इस तरह से नकारा हो। 2010 में RJD की ऐतिहासिक हार के बाद माना गया कि बिहार ने जंगलराज को प्रश्रय देने वाली पार्टी को जमीदोज कर दिया था। उसके उस स्मृति से हमेशा के लिए दूरी बना ली है जो उसके पिछड़ेपन का प्रतीक बनी हुई थी। नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल ने उस जनमत को और मजबूत किया। RJD को उस चुनाव में केवल 22 सीटें मिली थीं।

2010 बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम (साभार: ECI)

हालाँकि, 2015 आते-आते नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रयोगों के कारण RJD फिर जिंदा दिखाई देने लगी और उसकी नीतीश कुमार के साथ सत्ता में वापसी हो गई। इसके अगले चुनाव में भी हालात RJD के अनूकुल दिखाई दिए लेकिन उसके पीछे की बड़ी वजह चिराग पासवान थे। चिराग पासवान 2020 के चुनावों के दौरान नीतीश कुमार से नाराज थे और उनकी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे।

इसके कारण RJD को मदद मिली और पार्टी एक बार फिर ताकतवार बनकर वापस लौटी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस-RJD की जीत फिर भी इतनी बड़ी नहीं थी कि उन्हें सत्ता दिला पाती। इसी चुनाव में वामपंथी दलों ने भी वापसी की थी। 2020 के चुनावों में CPI (ML) (L) को 12 तो CPI और CPI (M) को 2-2 सीटें मिलीं। यानी लंबे वक्त पहले जिस वामपंथ को बिहार ने खारिज कर दिया था वो 16 सीटों के साथ उसके फिर से वापसी करने की अटकलें लगने लगी थीं।

2015-2020 बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे (फोटो: PRS India)

2024 में लोकसभा चुनावों में भी CPI (ML) (L) ने बिहार में 2 सीटों पर जीत दर्ज की और लगने लगा की लेफ्ट की पार्टियाँ बिहार में एक बार फिर दम दिखा रही हैं। CPI-ML ने यह संकेत दिया कि बिहार के कुछ हिस्सों में उसकी जमीन अब भी सुरक्षित है।

2024 बिहार लोकसभा चुनाव परिणाम (ECI)

चिराग द्वारा दी गई ऑक्सीजन जब इस वार वामपंथियों और RJD से हटी तो उन्हें अपनी असलियत दिख गई। बिहार की जनता से RJD और वामंपथी दलों की एक बार फिर से सूपड़ा साफ कर दिया। जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपना विश्वास और पुख्ता किया है। जिस तरह से एकजुट होकर NDA ने चुनाव लड़ा उससे अगर वोटरों के मन में कोई शंका थी भी तो वो भी दूर हो गई। जनता ने स्पष्ट और एक तरफा मत दिया, वोटों की इस सुनामी में वामपंथी दल साफ हो गए।

फिर से ना पनपे ‘विष बेल’: अब NDA की जिम्मेदारी

अब NDA के सामने भी चुनौती है कि वो इस जनादेश का सम्मान करे। जनता ने उसे सिर्फ ‘विकल्प’ नहीं बनाया है बल्कि पूर्ण ‘विश्वास’ भी दिया है। यह विश्वास इस बात पर आधारित है कि NDA बिहार को उन पुराने दौरों में वापस नहीं ले जाएगा जिनमें वामपंथी उग्रवाद, जातीय हिंसा, आपराधिक राजनीति और संस्थागत दुर्बलता हावी रहती थी।

NDA को भी यह समझना होगा कि आगे वो ऐसे किसी भी राजनीतिक प्रयोग से बचें जिससे वामपंथी दलों को फिर से ताकत मिल सके। यह जनमत अतीत को दफन करने का विश्वासमत है। यह जनमत दिखाता है कि बिहार के लोग अपने सुरक्षित भविष्य के लिए NDA पर भरोसा कर रहे हैं। PM मोदी और नीतीश कुमार पर भरोसा कर रहे हैं।

जनता ने स्थिरता और विकास के नाम पर फैसला सुनाया है। यह फैसला सिर्फ NDA के पक्ष में नहीं है बल्कि यह फैसला उस बिहार के पक्ष में है जो आगे बढ़ना चाहता है, जो अपने युवा को अवसर देना चाहता है और जो किसी भी कीमत पर अराजकता के दौर में वापसी नहीं चाहता।

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