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पहली बार हार से ही शुरू होता है भोजपुरी सितारों का राजनीतिक करियर, मनोज- निरहुआ-पवन से खेसारी तक दिखा यही पैटर्न: जानिए गैर-BJP पार्टियों के टिकट पर क्यों मिलती है मात? भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों की राजनीति में एंट्री अक्सर हार से होती है। चाहे ये किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हों या फिर निर्दलीय ही मैदान में उतरे हों। इस लिस्ट में एक से बढ़कर एक भोजपुरी फिल्मी सितारों का नाम शामिल है। इसमें मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) से लेकर बिहार चुनाव 2025 में हारे खेसारीलाल, रितेश पांडे तक का नाम लिया जा सकता है। भीड़ को ‘वोटर’ नहीं बना पाते कलाकार ज्यादातर ये कलाकार बिहार, यूपी और झारखंड के क्षेत्रों में लोकप्रिय होते हैं, क्योंकि यहाँ भोजपुरी जानने और समझने वालों की बड़ी आबादी रहती है। इन क्षेत्रों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र हैं। इनकी फिल्में, डायलॉग और गाने आम लोगों की जिंदगी से जुड़े होते हैं। इसलिए ये सेलिब्रिटीज भीड़ तो जमा कर लेते हैं और उन्हें देख कर उत्साहित भी होते हैं। लेकिन जब भीड़ को वोट में तब्दील करने की बारी आती है, तो पीछे रह जाते हैं। इसकी वजह रणनीतिक कमजोरी, अनुभव की कमी और स्थानीय मुद्दों पर इनकी कमजोर पकड़ को माना जा सकता है। कुछ उत्साहित जनता तो इन्हें वोट दे देती है, लेकिन आम लोग इन्हें वोट नहीं देते। जनता ये भी सोचती है कि अगर वोट दिया, तो जीतने के बाद फिर शायद दर्शन भी न दे। लेकिन, हारे हुए ये कलाकार जैसे ही बीजेपी से जुड़ते हैं, इनकी जीत का परचम लहराने लगता है। इसकी वजह है कि जनता सोचती है कि पार्टी उनके बीच रहेगी और कलाकार पार्टी से जुड़ा है, तो उस तक पहुँचना आसान होगा। मनोज तिवारी- भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और गायक रहे मनोज तिवारी ने अपने राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से की। 2009 लोकसभा चुनाव में वे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन बुरी तरह हार गए। राजनीति में पहली हार का सामना करने के बाद मनोज तिवारी ने पाला बदला और 2013 में बीजेपी ज्वाइन किया। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर- पूर्व दिल्ली से चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट पर बिहार-यूपी के लोग बड़ी संख्या में हैं। उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि लगातार तीन बार (2014, 2019, 2024) से जीतते आ रहे हैं। दिल्ली बीजेपी का ये एक प्रमुख चेहरा भी हैं। रवि किशन- भोजपुरी के बड़े सितारों में रवि किशन का नाम भी आता है। राजनीति में उन्होंने 2014 में एंट्री की और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस पर उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना उनकी बड़ी भूल थी। 3 साल बाद 2017 में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। लोकसभा चुनाव 2019 में उन्हें बीजेपी ने गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने जीत दर्ज की और दोबारा 2024 में भी गोरखपुर से ही बीजेपी के सांसद बने। दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’- भोजपुरी फिल्मों और ‘निरहुआ रिक्शावाला’ सीरीज से मशहूर हुए दिनेश लाल यादव 2019 में राजनीति में आए। उन्हें बीजेपी ने आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के गढ़ और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। जाहिर है टक्कर देने के बावजूद निरहुआ चुनाव हार गए। साल 2022 के उपचुनाव में आजमगढ़ सीट से उन्हें बीजेपी ने फिर मौका दिया। इस बार अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में वे चुनाव जीत गए। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के रिश्तेदार धर्मेन्द्र यादव से वे चुनाव हार गए। पवन सिंह- भोजपुरी ‘पावर स्टार’ पवन सिंह ने 2024 में बीजेपी का दामन थामा। पार्टी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने की घोषणा की, लेकिन उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और बिहार के काराकाट सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। यहाँ उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बिहार चुनाव 2025 में भी उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन व्यक्तिगत विवादों की वजह से चुनाव मैदान से उन्होंने दूरी बनाई। भोजपुरी सुपर स्टार खेसारी लाल यादव– बिहार चुनाव 2025 में राजनीति में एंट्री करते हुए उन्होंने आरजेडी की टिकट पर छपरा से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार छोटी कुमारी ने उन्हें हरा दिया। खेसारी लाल काफी लोकप्रिय कलाकार हैं और छपरा जैसे भोजपुरिया इलाके से चुनाव भी लड़ रहे थे, पर जीत नहीं पाए। अब उनका कहना है कि वो राजनीति से दूर रहेंगे। रितेश पांडे– बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की टिकट पर करगहर सीट से चुनाव मैदान में उतरने वाले भोजपुरी गायक रितेश पांडे को हार का सामना करना पड़ा। जाहिर है जब पार्टी ही खाता नहीं खोल पाई, तो रितेश कहाँ जीतते? लेकिन उन्हें वोट भी मात्र 7.45 फीसदी ही मिला। गुंजन सिंह– भोजपुरी एक्टर गुंजन सिंह ने लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार के नवादा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाया। उन्हें यहाँ बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी उम्मीदवार विवेक ठाकुर ने यहाँ से जीत हासिल की। गुंजन सिंह तीसरे नंबर पर रहे । उन्हें मात्र 3.4 फीसदी वोट मिले। कुणाल सिंह– लोकसभा चुनाव 2014 में भोजपुरी फिल्मों के दिग्गज कलाकार कुणाल सिंह ने राजनीति में आने की सोची। उन्होंने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के शत्रुघ्न सिन्हा से हार गए। क्यों गैर-बीजेपी पार्टियों से नहीं मिल पाती सफलता? भोजपुरी सितारे हों या पैराशूट कैंडिडेट, फिर राजनीति से इतर चाहे वो किसी भी बैकग्राउंड के हो। इनकी पॉपुलैरिटी इन्हें बीजेपी से इतर जीत नहीं दिला पाती। इसे समझने के लिए राजनीतिक जड़ को देखना होगा। दरअसल, किसी भी पार्टी में ऊपर से थोपे गए कैंडिडेट-भोजपुरी सितारे रैलियों में तो भीड़ खींच लेते हैं, लेकिन इनके नाम की घोषणा होने के साथ ही पार्टियों में रूठने मनाने का जो दौर शुरू होता है, वो थम नहीं पाता। बात खेसारी लाल यादव की ही करें, तो सालों से छपरा विधानसभा सीट पर जो आरजेडी नेता मेहनत कर रहा हो, उसकी जगह अचानक से मैदान में खेसारी लाल यादव आ गए। ऐसे में उसका नाराज होना तो बनता ही है। ऐसे में आरजेडी ने सालों से मेहनत किए पार्टी नेता को छोड़ दिया, तो उसमका नुकसान खेसारी को उठाना पड़ा। दूसरी बात, अगर उस नेता ने बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र के सभी अहम पदों पर लोगों के साथ तालमेल बिठाया, तो ये एक दिन काम नहीं। खेसारी लाल यादव टिकट मिलने के बाद मैदान में आए। अचानक पार्टी के सभी अहम लोग उनसे मिल तक नहीं पाए, संगठन और वोटिंग के दिन की तो बात भी छोड़ दीजिए। इस मामले के अलावा भी खेसारी लाल के खिलाफ उनकी कई बयानबाजियाँ भी गई। फिलहाल, ये मुद्दा यहाँ नहीं है। यहाँ बात भी सिर्फ खेसारी की नहीं हो रही, ये उदाहरण हर उसे पैराशूट कैंडिडेट पर लागू होती है, जबतक कि वो कोई करिश्माई व्यक्ति न हो। लोकप्रियता के साथ ‘काडर’ जरूरी चूँकि बीजेपी के अलावा ज्यादातर पार्टियों में हाई-कमान की तानाशाही चलती है, ऐसे में संगठन के जमीनी लोग पैराशूट कैंडिडेट से दूर हो जाते हैं। वहीं, बीजेपी में रूठों को मनाने की परंपरा रही है। एक-एक विधानसभा क्षेत्र में पूरी की पूरी ताकत झोंक देने की परपंरा रही है। प्रमोद महाजन इसे ‘कार्पेट मैनेजमेंट’ कहते थे। ये काम बीजेपी में अब भी होता है। ऐसे में बीजेपी में आकर इन नेताओं-अभिनेताओं को सफलता मिलनी पक्की हो जाती है। एक तरफ उनका खुद का करिश्माई व्यक्तित्व होता है, तो दूसरी तरफ संगठन का जोर, जो मतदाताओं के साथ घर से लेकर पोलिंग बूथ तक जुड़े रहते हैं। अब बड़े कैनवस पर देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि क्यों भोजपुरी स्टार्स की राजनीति में एंट्री होते ही हार मिलती है। साफ है कि उनके स्टारडम के जादू को वोटों में तब्दील कर पाने के लिए संगठन का वो साथ नहीं मिल पाता, जो जरूरी होता है। इसके उलट मैथिली ठाकुर का उदाहरण लें तो तमाम कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने उनकी जीत सुनिश्चित की, यहाँ तक कि खुद गृहमंत्री अमित शाह ने उनके लिए रैली को संबोधित किया। ये पूरा पैटर्न बताता है कि किसी भी स्तर पर चुनाव के लिए सिर्फ स्टारडम काफी नहीं होता, बल्कि इसके लिए चाहिए होते हैं समर्पित कार्यकर्ता। उनके साथ आता है विजन, रणनीति और राजनीतिक सोच, यही बीजेपी की असली ताकत है। इस बात को जो भी नेता-अभिनेता समझ जाते हैं, वो फिर बीजेपी के साथ जुड़ जाते हैं। इसे इस बात से समझिए कि रविकिशन को गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ाया गया और खुद योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री और लोकल गार्जियन उनके साथ खड़े रहे, ऐसे में रविकिशन को क्यों सफलता नहीं मिलती? वहीं, खेसारी हो या रितेश पांडे, ये अपने-अपने इलाके में सिर्फ क्राउड पुलर ही बन कर रह गए-वोट पुलर नहीं बन पाए।   Click to listen highlighted text! पहली बार हार से ही शुरू होता है भोजपुरी सितारों का राजनीतिक करियर, मनोज- निरहुआ-पवन से खेसारी तक दिखा यही पैटर्न: जानिए गैर-BJP पार्टियों के टिकट पर क्यों मिलती है मात? भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों की राजनीति में एंट्री अक्सर हार से होती है। चाहे ये किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हों या फिर निर्दलीय ही मैदान में उतरे हों। इस लिस्ट में एक से बढ़कर एक भोजपुरी फिल्मी सितारों का नाम शामिल है। इसमें मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) से लेकर बिहार चुनाव 2025 में हारे खेसारीलाल, रितेश पांडे तक का नाम लिया जा सकता है। भीड़ को ‘वोटर’ नहीं बना पाते कलाकार ज्यादातर ये कलाकार बिहार, यूपी और झारखंड के क्षेत्रों में लोकप्रिय होते हैं, क्योंकि यहाँ भोजपुरी जानने और समझने वालों की बड़ी आबादी रहती है। इन क्षेत्रों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र हैं। इनकी फिल्में, डायलॉग और गाने आम लोगों की जिंदगी से जुड़े होते हैं। इसलिए ये सेलिब्रिटीज भीड़ तो जमा कर लेते हैं और उन्हें देख कर उत्साहित भी होते हैं। लेकिन जब भीड़ को वोट में तब्दील करने की बारी आती है, तो पीछे रह जाते हैं। इसकी वजह रणनीतिक कमजोरी, अनुभव की कमी और स्थानीय मुद्दों पर इनकी कमजोर पकड़ को माना जा सकता है। कुछ उत्साहित जनता तो इन्हें वोट दे देती है, लेकिन आम लोग इन्हें वोट नहीं देते। जनता ये भी सोचती है कि अगर वोट दिया, तो जीतने के बाद फिर शायद दर्शन भी न दे। लेकिन, हारे हुए ये कलाकार जैसे ही बीजेपी से जुड़ते हैं, इनकी जीत का परचम लहराने लगता है। इसकी वजह है कि जनता सोचती है कि पार्टी उनके बीच रहेगी और कलाकार पार्टी से जुड़ा है, तो उस तक पहुँचना आसान होगा। मनोज तिवारी- भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और गायक रहे मनोज तिवारी ने अपने राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से की। 2009 लोकसभा चुनाव में वे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन बुरी तरह हार गए। राजनीति में पहली हार का सामना करने के बाद मनोज तिवारी ने पाला बदला और 2013 में बीजेपी ज्वाइन किया। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर- पूर्व दिल्ली से चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट पर बिहार-यूपी के लोग बड़ी संख्या में हैं। उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि लगातार तीन बार (2014, 2019, 2024) से जीतते आ रहे हैं। दिल्ली बीजेपी का ये एक प्रमुख चेहरा भी हैं। रवि किशन- भोजपुरी के बड़े सितारों में रवि किशन का नाम भी आता है। राजनीति में उन्होंने 2014 में एंट्री की और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस पर उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना उनकी बड़ी भूल थी। 3 साल बाद 2017 में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। लोकसभा चुनाव 2019 में उन्हें बीजेपी ने गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने जीत दर्ज की और दोबारा 2024 में भी गोरखपुर से ही बीजेपी के सांसद बने। दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’- भोजपुरी फिल्मों और ‘निरहुआ रिक्शावाला’ सीरीज से मशहूर हुए दिनेश लाल यादव 2019 में राजनीति में आए। उन्हें बीजेपी ने आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के गढ़ और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। जाहिर है टक्कर देने के बावजूद निरहुआ चुनाव हार गए। साल 2022 के उपचुनाव में आजमगढ़ सीट से उन्हें बीजेपी ने फिर मौका दिया। इस बार अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में वे चुनाव जीत गए। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के रिश्तेदार धर्मेन्द्र यादव से वे चुनाव हार गए। पवन सिंह- भोजपुरी ‘पावर स्टार’ पवन सिंह ने 2024 में बीजेपी का दामन थामा। पार्टी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने की घोषणा की, लेकिन उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और बिहार के काराकाट सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। यहाँ उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बिहार चुनाव 2025 में भी उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन व्यक्तिगत विवादों की वजह से चुनाव मैदान से उन्होंने दूरी बनाई। भोजपुरी सुपर स्टार खेसारी लाल यादव– बिहार चुनाव 2025 में राजनीति में एंट्री करते हुए उन्होंने आरजेडी की टिकट पर छपरा से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार छोटी कुमारी ने उन्हें हरा दिया। खेसारी लाल काफी लोकप्रिय कलाकार हैं और छपरा जैसे भोजपुरिया इलाके से चुनाव भी लड़ रहे थे, पर जीत नहीं पाए। अब उनका कहना है कि वो राजनीति से दूर रहेंगे। रितेश पांडे– बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की टिकट पर करगहर सीट से चुनाव मैदान में उतरने वाले भोजपुरी गायक रितेश पांडे को हार का सामना करना पड़ा। जाहिर है जब पार्टी ही खाता नहीं खोल पाई, तो रितेश कहाँ जीतते? लेकिन उन्हें वोट भी मात्र 7.45 फीसदी ही मिला। गुंजन सिंह– भोजपुरी एक्टर गुंजन सिंह ने लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार के नवादा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाया। उन्हें यहाँ बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी उम्मीदवार विवेक ठाकुर ने यहाँ से जीत हासिल की। गुंजन सिंह तीसरे नंबर पर रहे । उन्हें मात्र 3.4 फीसदी वोट मिले। कुणाल सिंह– लोकसभा चुनाव 2014 में भोजपुरी फिल्मों के दिग्गज कलाकार कुणाल सिंह ने राजनीति में आने की सोची। उन्होंने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के शत्रुघ्न सिन्हा से हार गए। क्यों गैर-बीजेपी पार्टियों से नहीं मिल पाती सफलता? भोजपुरी सितारे हों या पैराशूट कैंडिडेट, फिर राजनीति से इतर चाहे वो किसी भी बैकग्राउंड के हो। इनकी पॉपुलैरिटी इन्हें बीजेपी से इतर जीत नहीं दिला पाती। इसे समझने के लिए राजनीतिक जड़ को देखना होगा। दरअसल, किसी भी पार्टी में ऊपर से थोपे गए कैंडिडेट-भोजपुरी सितारे रैलियों में तो भीड़ खींच लेते हैं, लेकिन इनके नाम की घोषणा होने के साथ ही पार्टियों में रूठने मनाने का जो दौर शुरू होता है, वो थम नहीं पाता। बात खेसारी लाल यादव की ही करें, तो सालों से छपरा विधानसभा सीट पर जो आरजेडी नेता मेहनत कर रहा हो, उसकी जगह अचानक से मैदान में खेसारी लाल यादव आ गए। ऐसे में उसका नाराज होना तो बनता ही है। ऐसे में आरजेडी ने सालों से मेहनत किए पार्टी नेता को छोड़ दिया, तो उसमका नुकसान खेसारी को उठाना पड़ा। दूसरी बात, अगर उस नेता ने बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र के सभी अहम पदों पर लोगों के साथ तालमेल बिठाया, तो ये एक दिन काम नहीं। खेसारी लाल यादव टिकट मिलने के बाद मैदान में आए। अचानक पार्टी के सभी अहम लोग उनसे मिल तक नहीं पाए, संगठन और वोटिंग के दिन की तो बात भी छोड़ दीजिए। इस मामले के अलावा भी खेसारी लाल के खिलाफ उनकी कई बयानबाजियाँ भी गई। फिलहाल, ये मुद्दा यहाँ नहीं है। यहाँ बात भी सिर्फ खेसारी की नहीं हो रही, ये उदाहरण हर उसे पैराशूट कैंडिडेट पर लागू होती है, जबतक कि वो कोई करिश्माई व्यक्ति न हो। लोकप्रियता के साथ ‘काडर’ जरूरी चूँकि बीजेपी के अलावा ज्यादातर पार्टियों में हाई-कमान की तानाशाही चलती है, ऐसे में संगठन के जमीनी लोग पैराशूट कैंडिडेट से दूर हो जाते हैं। वहीं, बीजेपी में रूठों को मनाने की परंपरा रही है। एक-एक विधानसभा क्षेत्र में पूरी की पूरी ताकत झोंक देने की परपंरा रही है। प्रमोद महाजन इसे ‘कार्पेट मैनेजमेंट’ कहते थे। ये काम बीजेपी में अब भी होता है। ऐसे में बीजेपी में आकर इन नेताओं-अभिनेताओं को सफलता मिलनी पक्की हो जाती है। एक तरफ उनका खुद का करिश्माई व्यक्तित्व होता है, तो दूसरी तरफ संगठन का जोर, जो मतदाताओं के साथ घर से लेकर पोलिंग बूथ तक जुड़े रहते हैं। अब बड़े कैनवस पर देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि क्यों भोजपुरी स्टार्स की राजनीति में एंट्री होते ही हार मिलती है। साफ है कि उनके स्टारडम के जादू को वोटों में तब्दील कर पाने के लिए संगठन का वो साथ नहीं मिल पाता, जो जरूरी होता है। इसके उलट मैथिली ठाकुर का उदाहरण लें तो तमाम कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने उनकी जीत सुनिश्चित की, यहाँ तक कि खुद गृहमंत्री अमित शाह ने उनके लिए रैली को संबोधित किया। ये पूरा पैटर्न बताता है कि किसी भी स्तर पर चुनाव के लिए सिर्फ स्टारडम काफी नहीं होता, बल्कि इसके लिए चाहिए होते हैं समर्पित कार्यकर्ता। उनके साथ आता है विजन, रणनीति और राजनीतिक सोच, यही बीजेपी की असली ताकत है। इस बात को जो भी नेता-अभिनेता समझ जाते हैं, वो फिर बीजेपी के साथ जुड़ जाते हैं। इसे इस बात से समझिए कि रविकिशन को गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ाया गया और खुद योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री और लोकल गार्जियन उनके साथ खड़े रहे, ऐसे में रविकिशन को क्यों सफलता नहीं मिलती? वहीं, खेसारी हो या रितेश पांडे, ये अपने-अपने इलाके में सिर्फ क्राउड पुलर ही बन कर रह गए-वोट पुलर नहीं बन पाए।

पहली बार हार से ही शुरू होता है भोजपुरी सितारों का राजनीतिक करियर, मनोज- निरहुआ-पवन से खेसारी तक दिखा यही पैटर्न: जानिए गैर-BJP पार्टियों के टिकट पर क्यों मिलती है मात?

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों की राजनीति में एंट्री अक्सर हार से होती है। चाहे ये किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हों या फिर निर्दलीय ही मैदान में उतरे हों। इस लिस्ट में एक से बढ़कर एक भोजपुरी फिल्मी सितारों का नाम शामिल है। इसमें मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) से लेकर बिहार चुनाव 2025 में हारे खेसारीलाल, रितेश पांडे तक का नाम लिया जा सकता है।

भीड़ को ‘वोटर’ नहीं बना पाते कलाकार

ज्यादातर ये कलाकार बिहार, यूपी और झारखंड के क्षेत्रों में लोकप्रिय होते हैं, क्योंकि यहाँ भोजपुरी जानने और समझने वालों की बड़ी आबादी रहती है। इन क्षेत्रों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र हैं। इनकी फिल्में, डायलॉग और गाने आम लोगों की जिंदगी से जुड़े होते हैं। इसलिए ये सेलिब्रिटीज भीड़ तो जमा कर लेते हैं और उन्हें देख कर उत्साहित भी होते हैं। लेकिन जब भीड़ को वोट में तब्दील करने की बारी आती है, तो पीछे रह जाते हैं।

इसकी वजह रणनीतिक कमजोरी, अनुभव की कमी और स्थानीय मुद्दों पर इनकी कमजोर पकड़ को माना जा सकता है। कुछ उत्साहित जनता तो इन्हें वोट दे देती है, लेकिन आम लोग इन्हें वोट नहीं देते। जनता ये भी सोचती है कि अगर वोट दिया, तो जीतने के बाद फिर शायद दर्शन भी न दे।

लेकिन, हारे हुए ये कलाकार जैसे ही बीजेपी से जुड़ते हैं, इनकी जीत का परचम लहराने लगता है। इसकी वजह है कि जनता सोचती है कि पार्टी उनके बीच रहेगी और कलाकार पार्टी से जुड़ा है, तो उस तक पहुँचना आसान होगा।

मनोज तिवारी- भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और गायक रहे मनोज तिवारी ने अपने राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से की। 2009 लोकसभा चुनाव में वे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन बुरी तरह हार गए।

राजनीति में पहली हार का सामना करने के बाद मनोज तिवारी ने पाला बदला और 2013 में बीजेपी ज्वाइन किया। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर- पूर्व दिल्ली से चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट पर बिहार-यूपी के लोग बड़ी संख्या में हैं। उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि लगातार तीन बार (2014, 2019, 2024) से जीतते आ रहे हैं। दिल्ली बीजेपी का ये एक प्रमुख चेहरा भी हैं।

रवि किशन- भोजपुरी के बड़े सितारों में रवि किशन का नाम भी आता है। राजनीति में उन्होंने 2014 में एंट्री की और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस पर उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना उनकी बड़ी भूल थी।

3 साल बाद 2017 में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। लोकसभा चुनाव 2019 में उन्हें बीजेपी ने गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने जीत दर्ज की और दोबारा 2024 में भी गोरखपुर से ही बीजेपी के सांसद बने।

दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’- भोजपुरी फिल्मों और ‘निरहुआ रिक्शावाला’ सीरीज से मशहूर हुए दिनेश लाल यादव 2019 में राजनीति में आए। उन्हें बीजेपी ने आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के गढ़ और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। जाहिर है टक्कर देने के बावजूद निरहुआ चुनाव हार गए।

साल 2022 के उपचुनाव में आजमगढ़ सीट से उन्हें बीजेपी ने फिर मौका दिया। इस बार अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में वे चुनाव जीत गए। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के रिश्तेदार धर्मेन्द्र यादव से वे चुनाव हार गए।

पवन सिंह- भोजपुरी ‘पावर स्टार’ पवन सिंह ने 2024 में बीजेपी का दामन थामा। पार्टी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने की घोषणा की, लेकिन उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और बिहार के काराकाट सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। यहाँ उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

बिहार चुनाव 2025 में भी उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन व्यक्तिगत विवादों की वजह से चुनाव मैदान से उन्होंने दूरी बनाई।

भोजपुरी सुपर स्टार खेसारी लाल यादव– बिहार चुनाव 2025 में राजनीति में एंट्री करते हुए उन्होंने आरजेडी की टिकट पर छपरा से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार छोटी कुमारी ने उन्हें हरा दिया। खेसारी लाल काफी लोकप्रिय कलाकार हैं और छपरा जैसे भोजपुरिया इलाके से चुनाव भी लड़ रहे थे, पर जीत नहीं पाए। अब उनका कहना है कि वो राजनीति से दूर रहेंगे।

रितेश पांडे– बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की टिकट पर करगहर सीट से चुनाव मैदान में उतरने वाले भोजपुरी गायक रितेश पांडे को हार का सामना करना पड़ा। जाहिर है जब पार्टी ही खाता नहीं खोल पाई, तो रितेश कहाँ जीतते? लेकिन उन्हें वोट भी मात्र 7.45 फीसदी ही मिला।

गुंजन सिंह– भोजपुरी एक्टर गुंजन सिंह ने लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार के नवादा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाया। उन्हें यहाँ बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी उम्मीदवार विवेक ठाकुर ने यहाँ से जीत हासिल की। गुंजन सिंह तीसरे नंबर पर रहे । उन्हें मात्र 3.4 फीसदी वोट मिले।

कुणाल सिंह– लोकसभा चुनाव 2014 में भोजपुरी फिल्मों के दिग्गज कलाकार कुणाल सिंह ने राजनीति में आने की सोची। उन्होंने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के शत्रुघ्न सिन्हा से हार गए।

क्यों गैर-बीजेपी पार्टियों से नहीं मिल पाती सफलता?

भोजपुरी सितारे हों या पैराशूट कैंडिडेट, फिर राजनीति से इतर चाहे वो किसी भी बैकग्राउंड के हो। इनकी पॉपुलैरिटी इन्हें बीजेपी से इतर जीत नहीं दिला पाती। इसे समझने के लिए राजनीतिक जड़ को देखना होगा। दरअसल, किसी भी पार्टी में ऊपर से थोपे गए कैंडिडेट-भोजपुरी सितारे रैलियों में तो भीड़ खींच लेते हैं, लेकिन इनके नाम की घोषणा होने के साथ ही पार्टियों में रूठने मनाने का जो दौर शुरू होता है, वो थम नहीं पाता।

बात खेसारी लाल यादव की ही करें, तो सालों से छपरा विधानसभा सीट पर जो आरजेडी नेता मेहनत कर रहा हो, उसकी जगह अचानक से मैदान में खेसारी लाल यादव आ गए। ऐसे में उसका नाराज होना तो बनता ही है। ऐसे में आरजेडी ने सालों से मेहनत किए पार्टी नेता को छोड़ दिया, तो उसमका नुकसान खेसारी को उठाना पड़ा।

दूसरी बात, अगर उस नेता ने बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र के सभी अहम पदों पर लोगों के साथ तालमेल बिठाया, तो ये एक दिन काम नहीं। खेसारी लाल यादव टिकट मिलने के बाद मैदान में आए। अचानक पार्टी के सभी अहम लोग उनसे मिल तक नहीं पाए, संगठन और वोटिंग के दिन की तो बात भी छोड़ दीजिए। इस मामले के अलावा भी खेसारी लाल के खिलाफ उनकी कई बयानबाजियाँ भी गई। फिलहाल, ये मुद्दा यहाँ नहीं है। यहाँ बात भी सिर्फ खेसारी की नहीं हो रही, ये उदाहरण हर उसे पैराशूट कैंडिडेट पर लागू होती है, जबतक कि वो कोई करिश्माई व्यक्ति न हो।

लोकप्रियता के साथ ‘काडर’ जरूरी

चूँकि बीजेपी के अलावा ज्यादातर पार्टियों में हाई-कमान की तानाशाही चलती है, ऐसे में संगठन के जमीनी लोग पैराशूट कैंडिडेट से दूर हो जाते हैं। वहीं, बीजेपी में रूठों को मनाने की परंपरा रही है। एक-एक विधानसभा क्षेत्र में पूरी की पूरी ताकत झोंक देने की परपंरा रही है। प्रमोद महाजन इसे ‘कार्पेट मैनेजमेंट’ कहते थे। ये काम बीजेपी में अब भी होता है। ऐसे में बीजेपी में आकर इन नेताओं-अभिनेताओं को सफलता मिलनी पक्की हो जाती है। एक तरफ उनका खुद का करिश्माई व्यक्तित्व होता है, तो दूसरी तरफ संगठन का जोर, जो मतदाताओं के साथ घर से लेकर पोलिंग बूथ तक जुड़े रहते हैं।

अब बड़े कैनवस पर देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि क्यों भोजपुरी स्टार्स की राजनीति में एंट्री होते ही हार मिलती है। साफ है कि उनके स्टारडम के जादू को वोटों में तब्दील कर पाने के लिए संगठन का वो साथ नहीं मिल पाता, जो जरूरी होता है। इसके उलट मैथिली ठाकुर का उदाहरण लें तो तमाम कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने उनकी जीत सुनिश्चित की, यहाँ तक कि खुद गृहमंत्री अमित शाह ने उनके लिए रैली को संबोधित किया।

ये पूरा पैटर्न बताता है कि किसी भी स्तर पर चुनाव के लिए सिर्फ स्टारडम काफी नहीं होता, बल्कि इसके लिए चाहिए होते हैं समर्पित कार्यकर्ता। उनके साथ आता है विजन, रणनीति और राजनीतिक सोच, यही बीजेपी की असली ताकत है। इस बात को जो भी नेता-अभिनेता समझ जाते हैं, वो फिर बीजेपी के साथ जुड़ जाते हैं।

इसे इस बात से समझिए कि रविकिशन को गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ाया गया और खुद योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री और लोकल गार्जियन उनके साथ खड़े रहे, ऐसे में रविकिशन को क्यों सफलता नहीं मिलती? वहीं, खेसारी हो या रितेश पांडे, ये अपने-अपने इलाके में सिर्फ क्राउड पुलर ही बन कर रह गए-वोट पुलर नहीं बन पाए।

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