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बाढ़ या भारी बारिश से नहीं सूखे के चलते ‘खत्म हुई’ सिंधु घाटी सभ्यता: दशकों तक बार-बार पड़े अकाल ने कैसे बदला भारत का इतिहास, पढ़ें नए शोध में क्या-क्या आया सामने? सिंधु घाटी सभ्यता के पतन की कहानी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है। अब इसके पतन को लेकर नया दावा सामने आया है। Communications Earth & Environment में छपे एक नए शोध में कहा गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के पीछे लगातार आने वाले लंबे सूखे सबसे बड़ा कारण हो सकते हैं। इनमें 85 वर्ष और उससे अधिक समय तक चले सूखे भी शामिल हैं। यह सभ्यता आधुनिक भारत–पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में बसती थी और प्राचीन मिस्र के समय की या उससे भी पुरानी मानी जाती रही है। शोध के अनुसार, यह सभ्यता अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे खत्म हुई क्योंकि लगातार सूखे ने शहरों और समाज की मजबूती को नुकसान पहुँचाया था। यह निष्कर्ष न सिर्फ इतिहास की एक महत्वपूर्ण पहेली को समझने में मदद करता है बल्कि यह भी बताता है कि पर्यावरणीय बदलाव किसी भी सभ्यता को खत्म तक कर सकते हैं। शोध में क्या कहा गया है? IIT गाँधीनगर में PhD के छात्र हीरेन सोलंकी ने 4 अन्य लोगों के साथ मिलकर इस शोध को लिखा है। शोध के मुताबिक, उच्च-गुणवत्ता वाले पुरा-जलवायु अभिलेखों (paleoclimate archives) को प्राचीन नदी प्रवाह के पुनर्निर्माण और जलवायु मॉडल सिम्युलेशन के साथ जोड़कर शोधकर्ताओं ने यह संकेत पाया कि सिंधु नदी क्षेत्र में लगभग 4400 से 3400 वर्ष पहले दशकों से लेकर सदियों तक चलने वाले गंभीर और लगातार रहने वाले नदी-सूखे (river droughts) आए थे। शोध में बताया गया है कि नदी प्रवाह में कमी के व्यापक संकेत यह भी बताते हैं कि ये लंबे सूखे उस समय क्षेत्र में बारिश की कमी के साथ जुड़े हुए थे, जिससे मीठे पानी की उपलब्धता और कम हो गई। पानी की उपलब्धता में आई इस कमी और क्षेत्र में बढ़ती सूखी परिस्थितियों ने बड़े हड़प्पा शहरों से लोगों के बिखराव (migration) में भूमिका निभाई होगी। सिंधु नदी और सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) सिंधु नदी, प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) की रीढ़ मानी जाती थी। इसी नदी ने खेती, व्यापार और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लगातार पानी उपलब्ध कराया, जिससे यह सभ्यता आगे बढ़ती और मजबूत होती गई। लगभग 5000 साल पहले यह सभ्यता सिंधु और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसकर आकार लेती रही और परिपक्व हड़प्पा काल (4500–3900 वर्ष पूर्व) में अपने विकास के उच्चतम स्तर पर पहुँची। इस दौर में बड़े-बड़े सुनियोजित नगर, जल-निकास और प्रबंधन प्रणाली और लेखन प्रणाली देखने को मिलती है। करीब 3900 वर्ष पूर्व के आसपास इसके पतन की शुरुआत हो गई और समय बीतने के साथ यह महान सभ्यता इतिहास का हिस्सा बनकर रह गई। इसके पतन के कारण आज भी शोध का विषय हैं। माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर में कमी, लंबे सूखे और बाढ़, नदियों के मार्ग बदलने जैसे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक व राजनीतिक बदलाव भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। शोध के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन गर्मी के मानसून (ISM) और शीतकाल के मानसून (IWM) दोनों से प्रभावित होता था। होलोसीन (Holocene) काल के शुरुआती और मध्य चरण में ये दोनों मानसून एक-दूसरे से जुड़े हुए थे लेकिन मध्य से अंतिम होलोसीन में ये अलग-अलग प्रभाव डालने लगे। पुरा-जलवायु प्रमाणों से पता चलता है कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग कारकों ने जलवायु में परिवर्तन उत्पन्न किया है। शोधकर्ताओं ने सूखे का प्रभाव समझने के लिए कई तरह के प्रयास किए हैं। वैज्ञानिकों ने झीलों के तलछट (Sediment), गुफाओं में बने स्पेलियोथेम (गुफा-खनिज) और पौधों के अवशेष जैसी चीजों का अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने त्सो मोरीरी झील (उत्तर-पश्चिम हिमालय) के 4500 वर्ष पुराने तलछटों का अध्ययन करके पाया कि इस समय के आसपास मानसून में क्षेत्रीय बदलाव हुए और लगभग 4350 से 3450 वर्ष पूर्व तक का समय लंबे सूखे से जुड़ा हो सकता और इससे सिंधु सभ्यता में जल की कमी बढ़ी होगी। वैज्ञानिकों ने प्राचीन सूखे की पहचान के लिए शोधकर्ताओं ने सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) के एक निर्धारित क्षेत्र का अध्ययन किया, जिसमें जलवायु और जल उपलब्धता में समय के साथ हुए बदलावों को समझने के लिए ट्रांजिएंट क्लाइमेट सिमुलेशन और पुरामानविकी (paleoclimate) अभिलेखों का उपयोग किया गया। सिंधु घाटी क्षेत्र में 6000 वर्ष ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान (1850 ई.) तक बारिश में बदलाव (फोटो साभार:Nature) सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान पहला बड़ा सूखा D1 परिपक्व हड़प्पा काल की शुरुआत में करीब 4000 वर्ष पहले हुआ और इस दौरान 65% क्षेत्र सूखे की चपेट में था। यह सूखा लगभग 88 वर्षों तक चला लेकिन इसकी तीव्रता बाद के सूखों की तुलना में दो से तीन गुना कम थी। दूसरे सूखे D2 की तीव्रता तीसरे सूखे D3 से कम थी। इस दौरान मध्य सिंधु क्षेत्र पर असर अधिक पड़ा जबकि निचले और ऊपरी सिंधु क्षेत्र की तुलना में गन्वेरिवाला और कालीबंगा क्षेत्रों पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा। D4 सूखा लगभग 3531 वर्ष पूर्व शुरू हुआ और लगभग 114 वर्षों तक चला जिसमें लगभग 13% वर्षा में कमी दर्ज की गई। विभिन्न सूखों के दौरान IVC की स्थिति (फोटो साभार: Nature) शोध के मुताबिक, D1 से लेकर D4 तक आते-आते वार्षिक और ग्रीष्मकालीन वर्षा में लगातार कमी होती गई। साथ ही, शीतकालीन वर्षा में कमी तो D3 तक रही लेकिन D4 के दौरान इसमें कुछ सुधार देखा गया और इस दौरान D1 से D4 तक औसत वार्षिक तापमान भी बढ़ता रहा। जिससे वातावरण में जल की माँग बढ़ी होगी। 4000 से 3000 वर्ष पूर्व के बीच IVC क्षेत्र में शुष्कता अधिक स्पष्ट रूप से बढ़ी और विशेषकर अंतिम 3 सूखों के दौरान इसका प्रभाव सबसे ज्यादा केंद्रीय सिंधु क्षेत्र में देखा गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसी बदलती जलवायु परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए संभव है कि इसी समय में बस्तियों का झुकाव गंगा के मैदानी क्षेत्रों तथा सौराष्ट्र क्षेत्र की ओर बढ़ गया हो। शोध के अनुसार, पूर्व-हड़प्पा काल (PreH) के दौरान सिंधु घाटी सभ्यता के पश्चिमी क्षेत्र तथा ऊपरी गंगा मैदानों में बस्तियों की संख्या अधिक थी और यह उसी समय अधिक जल उपलब्धता से मेल खाती है। इस समय अधिकतर बस्तियाँ नदियों से दूर बनी थीं, जिससे पता चलता है कि उस दौर में वर्षा अधिक होती थी और पूरे क्षेत्र में मीठा पानी आसानी से मिल जाता था। उस काल में वर्षा आज की तुलना में 40–60% अधिक थी। शोधकर्ताओं के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में सूखे की शुरुआत लगभग 4440 वर्ष पहले हुई और इसी समय बस्तियों के पैटर्न तथा संस्कृति में भी बदलाव दिखने लगते हैं। जलवायु सिमुलेशन और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग दर्शाते हैं कि इस अवधि में 85 वर्ष से अधिक लंबे, कई गंभीर सूखे पड़े, जिनकी तीव्रता समय के साथ और बढ़ती गई। 4500–3000 वर्ष पूर्व तक गर्मी का मानसून कमजोर होता गया और सर्दी की वर्षा बढ़ती रही लेकिन 3300 वर्ष पूर्व के बाद सर्दी की वर्षा में भी गिरावट आई, जिससे हड़प्पा बस्तियों का बिखराव तेज हुआ। पहले दो सूखों के दौरान कुछ इलाकों में सर्दी की वर्षा थोड़ी राहत देती थी पर जब सर्दी की वर्षा भी कम होने लगी तो स्थिति और बिगड़ गई। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हड़प्पावासी पूर्व और दक्षिण की ओर (गंगा मैदान और सौराष्ट्र) बढ़ते गए। ऊपरी सिंधु क्षेत्र में नदी प्रवाह घटने से बस्तियों को नए इलाकों में जाना पड़ा जबकि सौराष्ट्र और हिमालय के निचली क्षेत्र में नमी अधिक स्थिर थी जिससे वहाँ कृषि लायक स्थितियाँ थीं। शोध में कहा गया है कि IVC का अंत अचानक नहीं था बल्कि धीरे-धीरे हुआ लंबा परिवर्तन, जिसमें जलवायु, कृषि अनुकूलन, व्यापार और सांस्कृतिक बदलाव सभी शामिल थे। कई प्रमाण दिखाते हैं कि सभ्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई बल्कि विकसित रूप बदलकर छोटे समुदायों और नई सांस्कृतिक पहचानों में विभाजित होकर आगे बढ़ी गई।   Click to listen highlighted text! बाढ़ या भारी बारिश से नहीं सूखे के चलते ‘खत्म हुई’ सिंधु घाटी सभ्यता: दशकों तक बार-बार पड़े अकाल ने कैसे बदला भारत का इतिहास, पढ़ें नए शोध में क्या-क्या आया सामने? सिंधु घाटी सभ्यता के पतन की कहानी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है। अब इसके पतन को लेकर नया दावा सामने आया है। Communications Earth & Environment में छपे एक नए शोध में कहा गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के पीछे लगातार आने वाले लंबे सूखे सबसे बड़ा कारण हो सकते हैं। इनमें 85 वर्ष और उससे अधिक समय तक चले सूखे भी शामिल हैं। यह सभ्यता आधुनिक भारत–पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में बसती थी और प्राचीन मिस्र के समय की या उससे भी पुरानी मानी जाती रही है। शोध के अनुसार, यह सभ्यता अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे खत्म हुई क्योंकि लगातार सूखे ने शहरों और समाज की मजबूती को नुकसान पहुँचाया था। यह निष्कर्ष न सिर्फ इतिहास की एक महत्वपूर्ण पहेली को समझने में मदद करता है बल्कि यह भी बताता है कि पर्यावरणीय बदलाव किसी भी सभ्यता को खत्म तक कर सकते हैं। शोध में क्या कहा गया है? IIT गाँधीनगर में PhD के छात्र हीरेन सोलंकी ने 4 अन्य लोगों के साथ मिलकर इस शोध को लिखा है। शोध के मुताबिक, उच्च-गुणवत्ता वाले पुरा-जलवायु अभिलेखों (paleoclimate archives) को प्राचीन नदी प्रवाह के पुनर्निर्माण और जलवायु मॉडल सिम्युलेशन के साथ जोड़कर शोधकर्ताओं ने यह संकेत पाया कि सिंधु नदी क्षेत्र में लगभग 4400 से 3400 वर्ष पहले दशकों से लेकर सदियों तक चलने वाले गंभीर और लगातार रहने वाले नदी-सूखे (river droughts) आए थे। शोध में बताया गया है कि नदी प्रवाह में कमी के व्यापक संकेत यह भी बताते हैं कि ये लंबे सूखे उस समय क्षेत्र में बारिश की कमी के साथ जुड़े हुए थे, जिससे मीठे पानी की उपलब्धता और कम हो गई। पानी की उपलब्धता में आई इस कमी और क्षेत्र में बढ़ती सूखी परिस्थितियों ने बड़े हड़प्पा शहरों से लोगों के बिखराव (migration) में भूमिका निभाई होगी। सिंधु नदी और सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) सिंधु नदी, प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) की रीढ़ मानी जाती थी। इसी नदी ने खेती, व्यापार और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लगातार पानी उपलब्ध कराया, जिससे यह सभ्यता आगे बढ़ती और मजबूत होती गई। लगभग 5000 साल पहले यह सभ्यता सिंधु और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसकर आकार लेती रही और परिपक्व हड़प्पा काल (4500–3900 वर्ष पूर्व) में अपने विकास के उच्चतम स्तर पर पहुँची। इस दौर में बड़े-बड़े सुनियोजित नगर, जल-निकास और प्रबंधन प्रणाली और लेखन प्रणाली देखने को मिलती है। करीब 3900 वर्ष पूर्व के आसपास इसके पतन की शुरुआत हो गई और समय बीतने के साथ यह महान सभ्यता इतिहास का हिस्सा बनकर रह गई। इसके पतन के कारण आज भी शोध का विषय हैं। माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर में कमी, लंबे सूखे और बाढ़, नदियों के मार्ग बदलने जैसे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक व राजनीतिक बदलाव भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। शोध के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन गर्मी के मानसून (ISM) और शीतकाल के मानसून (IWM) दोनों से प्रभावित होता था। होलोसीन (Holocene) काल के शुरुआती और मध्य चरण में ये दोनों मानसून एक-दूसरे से जुड़े हुए थे लेकिन मध्य से अंतिम होलोसीन में ये अलग-अलग प्रभाव डालने लगे। पुरा-जलवायु प्रमाणों से पता चलता है कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग कारकों ने जलवायु में परिवर्तन उत्पन्न किया है। शोधकर्ताओं ने सूखे का प्रभाव समझने के लिए कई तरह के प्रयास किए हैं। वैज्ञानिकों ने झीलों के तलछट (Sediment), गुफाओं में बने स्पेलियोथेम (गुफा-खनिज) और पौधों के अवशेष जैसी चीजों का अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने त्सो मोरीरी झील (उत्तर-पश्चिम हिमालय) के 4500 वर्ष पुराने तलछटों का अध्ययन करके पाया कि इस समय के आसपास मानसून में क्षेत्रीय बदलाव हुए और लगभग 4350 से 3450 वर्ष पूर्व तक का समय लंबे सूखे से जुड़ा हो सकता और इससे सिंधु सभ्यता में जल की कमी बढ़ी होगी। वैज्ञानिकों ने प्राचीन सूखे की पहचान के लिए शोधकर्ताओं ने सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) के एक निर्धारित क्षेत्र का अध्ययन किया, जिसमें जलवायु और जल उपलब्धता में समय के साथ हुए बदलावों को समझने के लिए ट्रांजिएंट क्लाइमेट सिमुलेशन और पुरामानविकी (paleoclimate) अभिलेखों का उपयोग किया गया। सिंधु घाटी क्षेत्र में 6000 वर्ष ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान (1850 ई.) तक बारिश में बदलाव (फोटो साभार:Nature) सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान पहला बड़ा सूखा D1 परिपक्व हड़प्पा काल की शुरुआत में करीब 4000 वर्ष पहले हुआ और इस दौरान 65% क्षेत्र सूखे की चपेट में था। यह सूखा लगभग 88 वर्षों तक चला लेकिन इसकी तीव्रता बाद के सूखों की तुलना में दो से तीन गुना कम थी। दूसरे सूखे D2 की तीव्रता तीसरे सूखे D3 से कम थी। इस दौरान मध्य सिंधु क्षेत्र पर असर अधिक पड़ा जबकि निचले और ऊपरी सिंधु क्षेत्र की तुलना में गन्वेरिवाला और कालीबंगा क्षेत्रों पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा। D4 सूखा लगभग 3531 वर्ष पूर्व शुरू हुआ और लगभग 114 वर्षों तक चला जिसमें लगभग 13% वर्षा में कमी दर्ज की गई। विभिन्न सूखों के दौरान IVC की स्थिति (फोटो साभार: Nature) शोध के मुताबिक, D1 से लेकर D4 तक आते-आते वार्षिक और ग्रीष्मकालीन वर्षा में लगातार कमी होती गई। साथ ही, शीतकालीन वर्षा में कमी तो D3 तक रही लेकिन D4 के दौरान इसमें कुछ सुधार देखा गया और इस दौरान D1 से D4 तक औसत वार्षिक तापमान भी बढ़ता रहा। जिससे वातावरण में जल की माँग बढ़ी होगी। 4000 से 3000 वर्ष पूर्व के बीच IVC क्षेत्र में शुष्कता अधिक स्पष्ट रूप से बढ़ी और विशेषकर अंतिम 3 सूखों के दौरान इसका प्रभाव सबसे ज्यादा केंद्रीय सिंधु क्षेत्र में देखा गया। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसी बदलती जलवायु परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए संभव है कि इसी समय में बस्तियों का झुकाव गंगा के मैदानी क्षेत्रों तथा सौराष्ट्र क्षेत्र की ओर बढ़ गया हो। शोध के अनुसार, पूर्व-हड़प्पा काल (PreH) के दौरान सिंधु घाटी सभ्यता के पश्चिमी क्षेत्र तथा ऊपरी गंगा मैदानों में बस्तियों की संख्या अधिक थी और यह उसी समय अधिक जल उपलब्धता से मेल खाती है। इस समय अधिकतर बस्तियाँ नदियों से दूर बनी थीं, जिससे पता चलता है कि उस दौर में वर्षा अधिक होती थी और पूरे क्षेत्र में मीठा पानी आसानी से मिल जाता था। उस काल में वर्षा आज की तुलना में 40–60% अधिक थी। शोधकर्ताओं के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में सूखे की शुरुआत लगभग 4440 वर्ष पहले हुई और इसी समय बस्तियों के पैटर्न तथा संस्कृति में भी बदलाव दिखने लगते हैं। जलवायु सिमुलेशन और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग दर्शाते हैं कि इस अवधि में 85 वर्ष से अधिक लंबे, कई गंभीर सूखे पड़े, जिनकी तीव्रता समय के साथ और बढ़ती गई। 4500–3000 वर्ष पूर्व तक गर्मी का मानसून कमजोर होता गया और सर्दी की वर्षा बढ़ती रही लेकिन 3300 वर्ष पूर्व के बाद सर्दी की वर्षा में भी गिरावट आई, जिससे हड़प्पा बस्तियों का बिखराव तेज हुआ। पहले दो सूखों के दौरान कुछ इलाकों में सर्दी की वर्षा थोड़ी राहत देती थी पर जब सर्दी की वर्षा भी कम होने लगी तो स्थिति और बिगड़ गई। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हड़प्पावासी पूर्व और दक्षिण की ओर (गंगा मैदान और सौराष्ट्र) बढ़ते गए। ऊपरी सिंधु क्षेत्र में नदी प्रवाह घटने से बस्तियों को नए इलाकों में जाना पड़ा जबकि सौराष्ट्र और हिमालय के निचली क्षेत्र में नमी अधिक स्थिर थी जिससे वहाँ कृषि लायक स्थितियाँ थीं। शोध में कहा गया है कि IVC का अंत अचानक नहीं था बल्कि धीरे-धीरे हुआ लंबा परिवर्तन, जिसमें जलवायु, कृषि अनुकूलन, व्यापार और सांस्कृतिक बदलाव सभी शामिल थे। कई प्रमाण दिखाते हैं कि सभ्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई बल्कि विकसित रूप बदलकर छोटे समुदायों और नई सांस्कृतिक पहचानों में विभाजित होकर आगे बढ़ी गई।

बाढ़ या भारी बारिश से नहीं सूखे के चलते ‘खत्म हुई’ सिंधु घाटी सभ्यता: दशकों तक बार-बार पड़े अकाल ने कैसे बदला भारत का इतिहास, पढ़ें नए शोध में क्या-क्या आया सामने?

सिंधु घाटी सभ्यता के पतन की कहानी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए है। अब इसके पतन को लेकर नया दावा सामने आया है। Communications Earth & Environment में छपे एक नए शोध में कहा गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के पीछे लगातार आने वाले लंबे सूखे सबसे बड़ा कारण हो सकते हैं। इनमें 85 वर्ष और उससे अधिक समय तक चले सूखे भी शामिल हैं।

यह सभ्यता आधुनिक भारत–पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में बसती थी और प्राचीन मिस्र के समय की या उससे भी पुरानी मानी जाती रही है। शोध के अनुसार, यह सभ्यता अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे खत्म हुई क्योंकि लगातार सूखे ने शहरों और समाज की मजबूती को नुकसान पहुँचाया था। यह निष्कर्ष न सिर्फ इतिहास की एक महत्वपूर्ण पहेली को समझने में मदद करता है बल्कि यह भी बताता है कि पर्यावरणीय बदलाव किसी भी सभ्यता को खत्म तक कर सकते हैं।

शोध में क्या कहा गया है?

IIT गाँधीनगर में PhD के छात्र हीरेन सोलंकी ने 4 अन्य लोगों के साथ मिलकर इस शोध को लिखा है। शोध के मुताबिक, उच्च-गुणवत्ता वाले पुरा-जलवायु अभिलेखों (paleoclimate archives) को प्राचीन नदी प्रवाह के पुनर्निर्माण और जलवायु मॉडल सिम्युलेशन के साथ जोड़कर शोधकर्ताओं ने यह संकेत पाया कि सिंधु नदी क्षेत्र में लगभग 4400 से 3400 वर्ष पहले दशकों से लेकर सदियों तक चलने वाले गंभीर और लगातार रहने वाले नदी-सूखे (river droughts) आए थे।

शोध में बताया गया है कि नदी प्रवाह में कमी के व्यापक संकेत यह भी बताते हैं कि ये लंबे सूखे उस समय क्षेत्र में बारिश की कमी के साथ जुड़े हुए थे, जिससे मीठे पानी की उपलब्धता और कम हो गई। पानी की उपलब्धता में आई इस कमी और क्षेत्र में बढ़ती सूखी परिस्थितियों ने बड़े हड़प्पा शहरों से लोगों के बिखराव (migration) में भूमिका निभाई होगी।

सिंधु नदी और सिंधु घाटी सभ्यता (IVC)

सिंधु नदी, प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) की रीढ़ मानी जाती थी। इसी नदी ने खेती, व्यापार और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लगातार पानी उपलब्ध कराया, जिससे यह सभ्यता आगे बढ़ती और मजबूत होती गई। लगभग 5000 साल पहले यह सभ्यता सिंधु और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसकर आकार लेती रही और परिपक्व हड़प्पा काल (4500–3900 वर्ष पूर्व) में अपने विकास के उच्चतम स्तर पर पहुँची। इस दौर में बड़े-बड़े सुनियोजित नगर, जल-निकास और प्रबंधन प्रणाली और लेखन प्रणाली देखने को मिलती है।

करीब 3900 वर्ष पूर्व के आसपास इसके पतन की शुरुआत हो गई और समय बीतने के साथ यह महान सभ्यता इतिहास का हिस्सा बनकर रह गई। इसके पतन के कारण आज भी शोध का विषय हैं। माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर में कमी, लंबे सूखे और बाढ़, नदियों के मार्ग बदलने जैसे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक व राजनीतिक बदलाव भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

शोध के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन गर्मी के मानसून (ISM) और शीतकाल के मानसून (IWM) दोनों से प्रभावित होता था। होलोसीन (Holocene) काल के शुरुआती और मध्य चरण में ये दोनों मानसून एक-दूसरे से जुड़े हुए थे लेकिन मध्य से अंतिम होलोसीन में ये अलग-अलग प्रभाव डालने लगे। पुरा-जलवायु प्रमाणों से पता चलता है कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग कारकों ने जलवायु में परिवर्तन उत्पन्न किया है।

शोधकर्ताओं ने सूखे का प्रभाव समझने के लिए कई तरह के प्रयास किए हैं। वैज्ञानिकों ने झीलों के तलछट (Sediment), गुफाओं में बने स्पेलियोथेम (गुफा-खनिज) और पौधों के अवशेष जैसी चीजों का अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने त्सो मोरीरी झील (उत्तर-पश्चिम हिमालय) के 4500 वर्ष पुराने तलछटों का अध्ययन करके पाया कि इस समय के आसपास मानसून में क्षेत्रीय बदलाव हुए और लगभग 4350 से 3450 वर्ष पूर्व तक का समय लंबे सूखे से जुड़ा हो सकता और इससे सिंधु सभ्यता में जल की कमी बढ़ी होगी।

वैज्ञानिकों ने प्राचीन सूखे की पहचान के लिए शोधकर्ताओं ने सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) के एक निर्धारित क्षेत्र का अध्ययन किया, जिसमें जलवायु और जल उपलब्धता में समय के साथ हुए बदलावों को समझने के लिए ट्रांजिएंट क्लाइमेट सिमुलेशन और पुरामानविकी (paleoclimate) अभिलेखों का उपयोग किया गया।

सिंधु घाटी क्षेत्र में 6000 वर्ष ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान (1850 ई.) तक बारिश में बदलाव (फोटो साभार:Nature)

सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान पहला बड़ा सूखा D1 परिपक्व हड़प्पा काल की शुरुआत में करीब 4000 वर्ष पहले हुआ और इस दौरान 65% क्षेत्र सूखे की चपेट में था। यह सूखा लगभग 88 वर्षों तक चला लेकिन इसकी तीव्रता बाद के सूखों की तुलना में दो से तीन गुना कम थी।

दूसरे सूखे D2 की तीव्रता तीसरे सूखे D3 से कम थी। इस दौरान मध्य सिंधु क्षेत्र पर असर अधिक पड़ा जबकि निचले और ऊपरी सिंधु क्षेत्र की तुलना में गन्वेरिवाला और कालीबंगा क्षेत्रों पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम रहा। D4 सूखा लगभग 3531 वर्ष पूर्व शुरू हुआ और लगभग 114 वर्षों तक चला जिसमें लगभग 13% वर्षा में कमी दर्ज की गई।

विभिन्न सूखों के दौरान IVC की स्थिति (फोटो साभार: Nature)

शोध के मुताबिक, D1 से लेकर D4 तक आते-आते वार्षिक और ग्रीष्मकालीन वर्षा में लगातार कमी होती गई। साथ ही, शीतकालीन वर्षा में कमी तो D3 तक रही लेकिन D4 के दौरान इसमें कुछ सुधार देखा गया और इस दौरान D1 से D4 तक औसत वार्षिक तापमान भी बढ़ता रहा। जिससे वातावरण में जल की माँग बढ़ी होगी। 4000 से 3000 वर्ष पूर्व के बीच IVC क्षेत्र में शुष्कता अधिक स्पष्ट रूप से बढ़ी और विशेषकर अंतिम 3 सूखों के दौरान इसका प्रभाव सबसे ज्यादा केंद्रीय सिंधु क्षेत्र में देखा गया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इसी बदलती जलवायु परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए संभव है कि इसी समय में बस्तियों का झुकाव गंगा के मैदानी क्षेत्रों तथा सौराष्ट्र क्षेत्र की ओर बढ़ गया हो। शोध के अनुसार, पूर्व-हड़प्पा काल (PreH) के दौरान सिंधु घाटी सभ्यता के पश्चिमी क्षेत्र तथा ऊपरी गंगा मैदानों में बस्तियों की संख्या अधिक थी और यह उसी समय अधिक जल उपलब्धता से मेल खाती है। इस समय अधिकतर बस्तियाँ नदियों से दूर बनी थीं, जिससे पता चलता है कि उस दौर में वर्षा अधिक होती थी और पूरे क्षेत्र में मीठा पानी आसानी से मिल जाता था। उस काल में वर्षा आज की तुलना में 40–60% अधिक थी।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, हड़प्पा क्षेत्र में सूखे की शुरुआत लगभग 4440 वर्ष पहले हुई और इसी समय बस्तियों के पैटर्न तथा संस्कृति में भी बदलाव दिखने लगते हैं। जलवायु सिमुलेशन और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग दर्शाते हैं कि इस अवधि में 85 वर्ष से अधिक लंबे, कई गंभीर सूखे पड़े, जिनकी तीव्रता समय के साथ और बढ़ती गई। 4500–3000 वर्ष पूर्व तक गर्मी का मानसून कमजोर होता गया और सर्दी की वर्षा बढ़ती रही लेकिन 3300 वर्ष पूर्व के बाद सर्दी की वर्षा में भी गिरावट आई, जिससे हड़प्पा बस्तियों का बिखराव तेज हुआ।

पहले दो सूखों के दौरान कुछ इलाकों में सर्दी की वर्षा थोड़ी राहत देती थी पर जब सर्दी की वर्षा भी कम होने लगी तो स्थिति और बिगड़ गई। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हड़प्पावासी पूर्व और दक्षिण की ओर (गंगा मैदान और सौराष्ट्र) बढ़ते गए। ऊपरी सिंधु क्षेत्र में नदी प्रवाह घटने से बस्तियों को नए इलाकों में जाना पड़ा जबकि सौराष्ट्र और हिमालय के निचली क्षेत्र में नमी अधिक स्थिर थी जिससे वहाँ कृषि लायक स्थितियाँ थीं।

शोध में कहा गया है कि IVC का अंत अचानक नहीं था बल्कि धीरे-धीरे हुआ लंबा परिवर्तन, जिसमें जलवायु, कृषि अनुकूलन, व्यापार और सांस्कृतिक बदलाव सभी शामिल थे। कई प्रमाण दिखाते हैं कि सभ्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई बल्कि विकसित रूप बदलकर छोटे समुदायों और नई सांस्कृतिक पहचानों में विभाजित होकर आगे बढ़ी गई।

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