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अधिक वोट पाने से तय नहीं होती ज्यादा सीटों पर जीत: समझिए ‘वोट शेयर’ का सारा खेल, पढ़िए क्यों RJD समर्थकों के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हैं खोखले बिहार में एनडीए ने शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की है। गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीती हैं। दूसरी ओर महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं। कॉन्ग्रेस की सीटें कम हुईं और राष्ट्रीय जनता दल मात्र 25 सीटें ही जीतने में कामयाब रहा। दोनों गठबंधनों द्वारा जीती गई सीटों में भारी अंतर होने के बावजूद, वोट शेयर के आँकड़े कुछ और बयाँ करते हैं। नतीजों के मुताबिक, राजद का वोट शेयर सबसे ज़्यादा 23% रहा। उसे 1,15,46,055 वोट मिले। भाजपा का वोट शेयर 20% और उसे 1,00,81,143 वोट मिले, जबकि जदयू को 96,67,118 वोट मिले, जो कुल वोटों का 19.25% है। राष्ट्रीय जनता दल को सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद 25 सीटें ही क्यों मिली? ये सवाल सबके मन में उठ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यह ‘वोट चोरी’ है, और राजद को वोट शेयर के आधार पर जीतना चाहिए था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सूरज जी नाइक ने इसे ‘बिहार में शुद्ध #वोटचोरी, जीत नहीं’ कहा और स्पष्टीकरण माँगा। Someone please make me understand how on earth is this possible – RJD – 18 million votes – 25 seats BJP – 9.6 million votes – 91 seats JDU – 9 million votes – 83 seats "This is pure #VoteChori in Bihar , not victory" pic.twitter.com/tOB39nFAFp— Suraj G Naik (@yoursurajnaik) November 14, 2025 RJD- 1.8 करोड़ वोट – 25 सीट BJP – 96 लाख वोट – 91 सीट JDU- 90 लाख वोट – 83 सीट “ये चोरी है, जीत नहीं ”वोट चोर, गद्दी छोड़— Sandeep Singh (@ActivistSandeep) November 15, 2025 कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह के पोस्ट किए। कुछ ने इसे चुनाव आयोग द्वारा आँकड़ों में हेरफेर बताया, तो कुछ ने ‘जादू/रहस्य’ को समझाने की कोशिश की। Gems of Election Commission 🙏Vote share 👇 RJD: 23.07 %✅BJP: 21.92 %JDU: 18.51 %Seats 👇BJP: 84JDU: 76RJD: 35❌Party with maximum vote share gets the least number of seats…in the Mother of Democracy.#BiharElection2025 pic.twitter.com/djyroj6oHL— D (@Deb_livnletliv) November 14, 2025 पहली नजर ये आँकड़ा लोगों को भ्रमित कर सकता है, लेकिन नतीजों में कोई गड़बड़ी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र को अपनाने के बाद से भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती आ रही है। सबसे अहम बात ये है कि चुनाव परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों में जितने मत मिलते हैं, उन पर निर्भर करता है। When the vote share stayed the same, how did the seats suddenly #skyrocket? Is this public support or political engineering?#GlobeTrotterEvent #BiharElection2025 #BirsaMunda #SanatanDharma pic.twitter.com/9YrR6NdkPM— Bole Bharat (@bole_bharat) November 15, 2025 ये कौन सा गणित है कोई समझाएगा? 👇वोट सबसे ज़्यादा RJD को और सीटें सबसे कम! Vote share RJD: 23.08 % BJP: 21.21 % JDU: 18.96 % Seats RJD: 28 BJP: 90 JDU: 81 मतलब चुनाव गणित का खेल है वोट का नहीं#BiharElection2025 #ElectionUpdates #NitishKumar #VoteChori #Lalu… pic.twitter.com/R8Y10y4ENz— Kashish (@Kkashish_k) November 14, 2025 वोट और सीटों का ग़ज़ब खेला !वोट सबसे ज़्यादा RJD को और सीटें सबसे कम!Vote share 👇 RJD: 23.07 %BJP: 21.92 %JDU: 18.51 %Seats 👇RJD: 35BJP: 84JDU: 76#BiharElection2025 pic.twitter.com/TDI7wMwAdS— Bhagat Ram (@bhagatram2020) November 14, 2025 चुनाव आयोग की वेबसाइट पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों के विस्तृत परिणाम उपलब्ध हैं। यहाँ हर निर्वाचन क्षेत्र में हर एक उम्मीदवार को मिले मतों को देखा जा सकता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में, जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा मत मिले, वह चुनाव जीत गया। जीत का अंतर 1 वोट हो या 1 लाख वोट, इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जीतता तो केवल एक व्यक्ति ही है। चूँकि भारत में अधिकांश सीटों पर कई उम्मीदवारों के बीच बहुकोणीय मुकाबला होता है, इसलिए जीतने वाले उम्मीदवार को आम तौर पर लगभग 30-35% वोट ही मिलते हैं। 50% से ज्यादा वोट लाने की हमारे यहाँ अनिवार्यता भी नहीं है, जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में होता है। किसी पार्टी को पूरे राज्य में मिले कुल वोट का चुनाव प्रणाली में कोई महत्व नहीं है। जीतने के लिए जरूरी है किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत लाना। यही कारण है कि एक पार्टी (या गठबंधन) अपने प्रतिद्वंद्वी से कम वोट पाकर भी ज्यादा सीटें जीत जाती है। अथवा ज्यादा वोट पाकर भी पार्टियाँ कम सीटें निकाल पाती हैं। यह केवल भारत में ही नहीं होता, बल्कि यूके, कनाडा जैसे देशों में भी होता है। हालाँकि, बहुदलीय प्रणाली और गठबंधन की वजह से भारत में खासकर विधानसभा चुनाव में ये साफ दिख जाता है। अधिकांश पश्चिमी देशों में ऐसा कम देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ 2-4 प्रमुख पार्टियाँ हैं। राजद को अधिक वोट मिलने का कारण यह है कि उन्होंने कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालाँकि वे ज़्यादातर सीटें नहीं जीत पाए, फिर भी उन्हें उन निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा-खासा वोट मिला। इससे पार्टी के कुल वोटों की संख्या में इजाफा हुआ। राजद ने जहाँ 143 सीटों पर चुनाव लड़ा, वहीं भाजपा और जदयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा। यानी, राजद के कुल वोटों में 42 अतिरिक्त सीटों के वोट जुड़ गए। इसलिए कुल वोटों को लेकर बीजेपी या जदयू से उसकी तुलना करना गलत है। भारतीय चुनावों में वोट शेयर और जीती हुई सीटों के बीच कई अंतर होते हैं। जो पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ती है। और उन सीटों पर उनके वोटर ज्यादा हैं, तो औसत वोट उसे ज्यादा मिलेगा, वहीं अगर कोई पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है, यहाँ तक कि उन सीटों पर भी जहाँ वह जीत नहीं सकती, तो भी उसे उन सीटों पर कुछ वोट मिलेंगे। इससे पार्टी को मिले कुल वोटों में तो बढ़ोतरी होगी, लेकिन सीटें जीतना संभव नहीं होगा। एक और वजह यह है कि विपक्षी दलों में, राजद ने अपने सहयोगियों की तुलना में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका मतलब है कि हारने वाली सीटों पर भी, वह काफी वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। इससे पार्टी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन जीती हुई सीटें नहीं बढ़ीं। गौरतलब है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अलग-अलग होती है। कहीं ज्यादा मतदाता होते हैं तो कहीं बेहद कम। इसलिए जब कोई पार्टी कम अंतर से ज्यादा आबादी वाली सीट हारती है, तो उसके वोट शेयर में काफी वोट जुड़ जाते हैं। लेकिन नतीजों पर उसका फर्क नहीं पड़ता। यह भी सच है कि राजद ने भाजपा और जद(यू) से 42 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भाजपा से केवल 14 लाख और जद(यू) से केवल 18 लाख ज़्यादा वोट मिले। चूँकि राजद 42 सीटों पर भी वोट मिले, इसलिए उसके द्वारा लड़ी गई प्रत्येक सीट पर औसत वोट भाजपा और जद(यू) से कम हो गया। महागठबंधन में ‘फ्रैंडली फाइट’ 12 सीटों पर हुई। इन सीटों पर एनडीए का पूरा वोट एक ही उम्मीदवार को गया, वहीं महागठबंधन के वोट उन्हीं सीटों पर गठबंधन के 2-3 उम्मीदवारों में बँट गए। इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि बिहार में सबसे ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बावजूद राजद को केवल 25 सीटें ही क्यों मिलीं, इसमें कोई रहस्य नहीं है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती है। राजद के उम्मीदवार अपनी-अपनी सीटें हार गए, और यही बात मायने रखती है, पार्टी को मिले कुल वोट नहीं। अगर किसी उम्मीदवार या पार्टी को लगता है कि मतगणना प्रक्रिया या परिणामों की घोषणा में कोई गड़बड़ी हुई है, तो वे याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए कोई ठोस वजह बताना पड़ता है। गौरतलब है कि मतगणना सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया उम्मीदवारों और पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में होती है। बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में राहुल गाँधी और महागठबंधन के नेताओं ने जमकर शोर मचाया, लेकिन कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की। इसी तरह ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रही राजद या कॉन्ग्रेस का कोई भी उम्मीदवार परिणामों को कोर्ट में चुनौती देगा, इसकी संभावना नहीं दिख रही। ये सिर्फ ‘वोट चोरी’ का आरोप हर मंच पर लगाएँगे। इसलिए सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद राजद ने इतनी कम सीटें कैसे जीतीं? इसका जवाब मिल गया होगा। यह किसी ‘वोट चोरी’ या किसी गड़बड़ी की ओर इशारा नहीं करता। यह संविधान सभा द्वारा अपनाई गई चुनाव प्रणाली के अनुसार है, और यह तब तक लागू रहेगा जब तक संविधान में बदलाव नहीं किया जाता और भारत कोई अलग चुनाव पद्धति नहीं अपना लेता।   Click to listen highlighted text! अधिक वोट पाने से तय नहीं होती ज्यादा सीटों पर जीत: समझिए ‘वोट शेयर’ का सारा खेल, पढ़िए क्यों RJD समर्थकों के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हैं खोखले बिहार में एनडीए ने शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की है। गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीती हैं। दूसरी ओर महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं। कॉन्ग्रेस की सीटें कम हुईं और राष्ट्रीय जनता दल मात्र 25 सीटें ही जीतने में कामयाब रहा। दोनों गठबंधनों द्वारा जीती गई सीटों में भारी अंतर होने के बावजूद, वोट शेयर के आँकड़े कुछ और बयाँ करते हैं। नतीजों के मुताबिक, राजद का वोट शेयर सबसे ज़्यादा 23% रहा। उसे 1,15,46,055 वोट मिले। भाजपा का वोट शेयर 20% और उसे 1,00,81,143 वोट मिले, जबकि जदयू को 96,67,118 वोट मिले, जो कुल वोटों का 19.25% है। राष्ट्रीय जनता दल को सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद 25 सीटें ही क्यों मिली? ये सवाल सबके मन में उठ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यह ‘वोट चोरी’ है, और राजद को वोट शेयर के आधार पर जीतना चाहिए था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सूरज जी नाइक ने इसे ‘बिहार में शुद्ध #वोटचोरी, जीत नहीं’ कहा और स्पष्टीकरण माँगा। Someone please make me understand how on earth is this possible – RJD – 18 million votes – 25 seats BJP – 9.6 million votes – 91 seats JDU – 9 million votes – 83 seats "This is pure #VoteChori in Bihar , not victory" pic.twitter.com/tOB39nFAFp— Suraj G Naik (@yoursurajnaik) November 14, 2025 RJD- 1.8 करोड़ वोट – 25 सीट BJP – 96 लाख वोट – 91 सीट JDU- 90 लाख वोट – 83 सीट “ये चोरी है, जीत नहीं ”वोट चोर, गद्दी छोड़— Sandeep Singh (@ActivistSandeep) November 15, 2025 कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह के पोस्ट किए। कुछ ने इसे चुनाव आयोग द्वारा आँकड़ों में हेरफेर बताया, तो कुछ ने ‘जादू/रहस्य’ को समझाने की कोशिश की। Gems of Election Commission 🙏Vote share 👇 RJD: 23.07 %✅BJP: 21.92 %JDU: 18.51 %Seats 👇BJP: 84JDU: 76RJD: 35❌Party with maximum vote share gets the least number of seats…in the Mother of Democracy.#BiharElection2025 pic.twitter.com/djyroj6oHL— D (@Deb_livnletliv) November 14, 2025 पहली नजर ये आँकड़ा लोगों को भ्रमित कर सकता है, लेकिन नतीजों में कोई गड़बड़ी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र को अपनाने के बाद से भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती आ रही है। सबसे अहम बात ये है कि चुनाव परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों में जितने मत मिलते हैं, उन पर निर्भर करता है। When the vote share stayed the same, how did the seats suddenly #skyrocket? Is this public support or political engineering?#GlobeTrotterEvent #BiharElection2025 #BirsaMunda #SanatanDharma pic.twitter.com/9YrR6NdkPM— Bole Bharat (@bole_bharat) November 15, 2025 ये कौन सा गणित है कोई समझाएगा? 👇वोट सबसे ज़्यादा RJD को और सीटें सबसे कम! Vote share RJD: 23.08 % BJP: 21.21 % JDU: 18.96 % Seats RJD: 28 BJP: 90 JDU: 81 मतलब चुनाव गणित का खेल है वोट का नहीं#BiharElection2025 #ElectionUpdates #NitishKumar #VoteChori #Lalu… pic.twitter.com/R8Y10y4ENz— Kashish (@Kkashish_k) November 14, 2025 वोट और सीटों का ग़ज़ब खेला !वोट सबसे ज़्यादा RJD को और सीटें सबसे कम!Vote share 👇 RJD: 23.07 %BJP: 21.92 %JDU: 18.51 %Seats 👇RJD: 35BJP: 84JDU: 76#BiharElection2025 pic.twitter.com/TDI7wMwAdS— Bhagat Ram (@bhagatram2020) November 14, 2025 चुनाव आयोग की वेबसाइट पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों के विस्तृत परिणाम उपलब्ध हैं। यहाँ हर निर्वाचन क्षेत्र में हर एक उम्मीदवार को मिले मतों को देखा जा सकता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में, जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा मत मिले, वह चुनाव जीत गया। जीत का अंतर 1 वोट हो या 1 लाख वोट, इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जीतता तो केवल एक व्यक्ति ही है। चूँकि भारत में अधिकांश सीटों पर कई उम्मीदवारों के बीच बहुकोणीय मुकाबला होता है, इसलिए जीतने वाले उम्मीदवार को आम तौर पर लगभग 30-35% वोट ही मिलते हैं। 50% से ज्यादा वोट लाने की हमारे यहाँ अनिवार्यता भी नहीं है, जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में होता है। किसी पार्टी को पूरे राज्य में मिले कुल वोट का चुनाव प्रणाली में कोई महत्व नहीं है। जीतने के लिए जरूरी है किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत लाना। यही कारण है कि एक पार्टी (या गठबंधन) अपने प्रतिद्वंद्वी से कम वोट पाकर भी ज्यादा सीटें जीत जाती है। अथवा ज्यादा वोट पाकर भी पार्टियाँ कम सीटें निकाल पाती हैं। यह केवल भारत में ही नहीं होता, बल्कि यूके, कनाडा जैसे देशों में भी होता है। हालाँकि, बहुदलीय प्रणाली और गठबंधन की वजह से भारत में खासकर विधानसभा चुनाव में ये साफ दिख जाता है। अधिकांश पश्चिमी देशों में ऐसा कम देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ 2-4 प्रमुख पार्टियाँ हैं। राजद को अधिक वोट मिलने का कारण यह है कि उन्होंने कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालाँकि वे ज़्यादातर सीटें नहीं जीत पाए, फिर भी उन्हें उन निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा-खासा वोट मिला। इससे पार्टी के कुल वोटों की संख्या में इजाफा हुआ। राजद ने जहाँ 143 सीटों पर चुनाव लड़ा, वहीं भाजपा और जदयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा। यानी, राजद के कुल वोटों में 42 अतिरिक्त सीटों के वोट जुड़ गए। इसलिए कुल वोटों को लेकर बीजेपी या जदयू से उसकी तुलना करना गलत है। भारतीय चुनावों में वोट शेयर और जीती हुई सीटों के बीच कई अंतर होते हैं। जो पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ती है। और उन सीटों पर उनके वोटर ज्यादा हैं, तो औसत वोट उसे ज्यादा मिलेगा, वहीं अगर कोई पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है, यहाँ तक कि उन सीटों पर भी जहाँ वह जीत नहीं सकती, तो भी उसे उन सीटों पर कुछ वोट मिलेंगे। इससे पार्टी को मिले कुल वोटों में तो बढ़ोतरी होगी, लेकिन सीटें जीतना संभव नहीं होगा। एक और वजह यह है कि विपक्षी दलों में, राजद ने अपने सहयोगियों की तुलना में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका मतलब है कि हारने वाली सीटों पर भी, वह काफी वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। इससे पार्टी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन जीती हुई सीटें नहीं बढ़ीं। गौरतलब है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अलग-अलग होती है। कहीं ज्यादा मतदाता होते हैं तो कहीं बेहद कम। इसलिए जब कोई पार्टी कम अंतर से ज्यादा आबादी वाली सीट हारती है, तो उसके वोट शेयर में काफी वोट जुड़ जाते हैं। लेकिन नतीजों पर उसका फर्क नहीं पड़ता। यह भी सच है कि राजद ने भाजपा और जद(यू) से 42 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भाजपा से केवल 14 लाख और जद(यू) से केवल 18 लाख ज़्यादा वोट मिले। चूँकि राजद 42 सीटों पर भी वोट मिले, इसलिए उसके द्वारा लड़ी गई प्रत्येक सीट पर औसत वोट भाजपा और जद(यू) से कम हो गया। महागठबंधन में ‘फ्रैंडली फाइट’ 12 सीटों पर हुई। इन सीटों पर एनडीए का पूरा वोट एक ही उम्मीदवार को गया, वहीं महागठबंधन के वोट उन्हीं सीटों पर गठबंधन के 2-3 उम्मीदवारों में बँट गए। इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि बिहार में सबसे ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बावजूद राजद को केवल 25 सीटें ही क्यों मिलीं, इसमें कोई रहस्य नहीं है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती है। राजद के उम्मीदवार अपनी-अपनी सीटें हार गए, और यही बात मायने रखती है, पार्टी को मिले कुल वोट नहीं। अगर किसी उम्मीदवार या पार्टी को लगता है कि मतगणना प्रक्रिया या परिणामों की घोषणा में कोई गड़बड़ी हुई है, तो वे याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए कोई ठोस वजह बताना पड़ता है। गौरतलब है कि मतगणना सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया उम्मीदवारों और पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में होती है। बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में राहुल गाँधी और महागठबंधन के नेताओं ने जमकर शोर मचाया, लेकिन कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की। इसी तरह ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रही राजद या कॉन्ग्रेस का कोई भी उम्मीदवार परिणामों को कोर्ट में चुनौती देगा, इसकी संभावना नहीं दिख रही। ये सिर्फ ‘वोट चोरी’ का आरोप हर मंच पर लगाएँगे। इसलिए सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद राजद ने इतनी कम सीटें कैसे जीतीं? इसका जवाब मिल गया होगा। यह किसी ‘वोट चोरी’ या किसी गड़बड़ी की ओर इशारा नहीं करता। यह संविधान सभा द्वारा अपनाई गई चुनाव प्रणाली के अनुसार है, और यह तब तक लागू रहेगा जब तक संविधान में बदलाव नहीं किया जाता और भारत कोई अलग चुनाव पद्धति नहीं अपना लेता।

अधिक वोट पाने से तय नहीं होती ज्यादा सीटों पर जीत: समझिए ‘वोट शेयर’ का सारा खेल, पढ़िए क्यों RJD समर्थकों के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हैं खोखले

बिहार में एनडीए ने शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की है। गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीती हैं। दूसरी ओर महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं। कॉन्ग्रेस की सीटें कम हुईं और राष्ट्रीय जनता दल मात्र 25 सीटें ही जीतने में कामयाब रहा।

दोनों गठबंधनों द्वारा जीती गई सीटों में भारी अंतर होने के बावजूद, वोट शेयर के आँकड़े कुछ और बयाँ करते हैं। नतीजों के मुताबिक, राजद का वोट शेयर सबसे ज़्यादा 23% रहा। उसे 1,15,46,055 वोट मिले। भाजपा का वोट शेयर 20% और उसे 1,00,81,143 वोट मिले, जबकि जदयू को 96,67,118 वोट मिले, जो कुल वोटों का 19.25% है।

राष्ट्रीय जनता दल को सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद 25 सीटें ही क्यों मिली? ये सवाल सबके मन में उठ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यह ‘वोट चोरी’ है, और राजद को वोट शेयर के आधार पर जीतना चाहिए था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सूरज जी नाइक ने इसे ‘बिहार में शुद्ध #वोटचोरी, जीत नहीं’ कहा और स्पष्टीकरण माँगा।

Someone please make me understand how on earth is this possible – RJD – 18 million votes – 25 seats BJP – 9.6 million votes – 91 seats JDU – 9 million votes – 83 seats "This is pure #VoteChori in Bihar , not victory" pic.twitter.com/tOB39nFAFp— Suraj G Naik (@yoursurajnaik) November 14, 2025

RJD- 1.8 करोड़ वोट – 25 सीट BJP – 96 लाख वोट – 91 सीट JDU- 90 लाख वोट – 83 सीट “ये चोरी है, जीत नहीं ”वोट चोर, गद्दी छोड़— Sandeep Singh (@ActivistSandeep) November 15, 2025

कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह के पोस्ट किए। कुछ ने इसे चुनाव आयोग द्वारा आँकड़ों में हेरफेर बताया, तो कुछ ने ‘जादू/रहस्य’ को समझाने की कोशिश की।

Gems of Election Commission 🙏Vote share 👇 RJD: 23.07 %✅BJP: 21.92 %JDU: 18.51 %Seats 👇BJP: 84JDU: 76RJD: 35❌Party with maximum vote share gets the least number of seats…in the Mother of Democracy.#BiharElection2025 pic.twitter.com/djyroj6oHL— D (@Deb_livnletliv) November 14, 2025

पहली नजर ये आँकड़ा लोगों को भ्रमित कर सकता है, लेकिन नतीजों में कोई गड़बड़ी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र को अपनाने के बाद से भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती आ रही है। सबसे अहम बात ये है कि चुनाव परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों में जितने मत मिलते हैं, उन पर निर्भर करता है।

When the vote share stayed the same, how did the seats suddenly #skyrocket? Is this public support or political engineering?#GlobeTrotterEvent #BiharElection2025 #BirsaMunda #SanatanDharma pic.twitter.com/9YrR6NdkPM— Bole Bharat (@bole_bharat) November 15, 2025

ये कौन सा गणित है कोई समझाएगा? 👇वोट सबसे ज़्यादा RJD को और सीटें सबसे कम! Vote share RJD: 23.08 % BJP: 21.21 % JDU: 18.96 % Seats RJD: 28 BJP: 90 JDU: 81 मतलब चुनाव गणित का खेल है वोट का नहीं#BiharElection2025 #ElectionUpdates #NitishKumar #VoteChori #Lalu… pic.twitter.com/R8Y10y4ENz— Kashish (@Kkashish_k) November 14, 2025

वोट और सीटों का ग़ज़ब खेला !वोट सबसे ज़्यादा RJD को और सीटें सबसे कम!Vote share 👇 RJD: 23.07 %BJP: 21.92 %JDU: 18.51 %Seats 👇RJD: 35BJP: 84JDU: 76#BiharElection2025 pic.twitter.com/TDI7wMwAdS— Bhagat Ram (@bhagatram2020) November 14, 2025

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों के विस्तृत परिणाम उपलब्ध हैं। यहाँ हर निर्वाचन क्षेत्र में हर एक उम्मीदवार को मिले मतों को देखा जा सकता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में, जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा मत मिले, वह चुनाव जीत गया। जीत का अंतर 1 वोट हो या 1 लाख वोट, इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जीतता तो केवल एक व्यक्ति ही है।

चूँकि भारत में अधिकांश सीटों पर कई उम्मीदवारों के बीच बहुकोणीय मुकाबला होता है, इसलिए जीतने वाले उम्मीदवार को आम तौर पर लगभग 30-35% वोट ही मिलते हैं। 50% से ज्यादा वोट लाने की हमारे यहाँ अनिवार्यता भी नहीं है, जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में होता है।

किसी पार्टी को पूरे राज्य में मिले कुल वोट का चुनाव प्रणाली में कोई महत्व नहीं है। जीतने के लिए जरूरी है किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत लाना। यही कारण है कि एक पार्टी (या गठबंधन) अपने प्रतिद्वंद्वी से कम वोट पाकर भी ज्यादा सीटें जीत जाती है। अथवा ज्यादा वोट पाकर भी पार्टियाँ कम सीटें निकाल पाती हैं।

यह केवल भारत में ही नहीं होता, बल्कि यूके, कनाडा जैसे देशों में भी होता है। हालाँकि, बहुदलीय प्रणाली और गठबंधन की वजह से भारत में खासकर विधानसभा चुनाव में ये साफ दिख जाता है। अधिकांश पश्चिमी देशों में ऐसा कम देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ 2-4 प्रमुख पार्टियाँ हैं।

राजद को अधिक वोट मिलने का कारण यह है कि उन्होंने कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालाँकि वे ज़्यादातर सीटें नहीं जीत पाए, फिर भी उन्हें उन निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा-खासा वोट मिला। इससे पार्टी के कुल वोटों की संख्या में इजाफा हुआ। राजद ने जहाँ 143 सीटों पर चुनाव लड़ा, वहीं भाजपा और जदयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा। यानी, राजद के कुल वोटों में 42 अतिरिक्त सीटों के वोट जुड़ गए। इसलिए कुल वोटों को लेकर बीजेपी या जदयू से उसकी तुलना करना गलत है।

भारतीय चुनावों में वोट शेयर और जीती हुई सीटों के बीच कई अंतर होते हैं। जो पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ती है। और उन सीटों पर उनके वोटर ज्यादा हैं, तो औसत वोट उसे ज्यादा मिलेगा, वहीं अगर कोई पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है, यहाँ तक कि उन सीटों पर भी जहाँ वह जीत नहीं सकती, तो भी उसे उन सीटों पर कुछ वोट मिलेंगे। इससे पार्टी को मिले कुल वोटों में तो बढ़ोतरी होगी, लेकिन सीटें जीतना संभव नहीं होगा।

एक और वजह यह है कि विपक्षी दलों में, राजद ने अपने सहयोगियों की तुलना में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका मतलब है कि हारने वाली सीटों पर भी, वह काफी वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। इससे पार्टी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन जीती हुई सीटें नहीं बढ़ीं।

गौरतलब है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अलग-अलग होती है। कहीं ज्यादा मतदाता होते हैं तो कहीं बेहद कम। इसलिए जब कोई पार्टी कम अंतर से ज्यादा आबादी वाली सीट हारती है, तो उसके वोट शेयर में काफी वोट जुड़ जाते हैं। लेकिन नतीजों पर उसका फर्क नहीं पड़ता।

यह भी सच है कि राजद ने भाजपा और जद(यू) से 42 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भाजपा से केवल 14 लाख और जद(यू) से केवल 18 लाख ज़्यादा वोट मिले। चूँकि राजद 42 सीटों पर भी वोट मिले, इसलिए उसके द्वारा लड़ी गई प्रत्येक सीट पर औसत वोट भाजपा और जद(यू) से कम हो गया।

महागठबंधन में ‘फ्रैंडली फाइट’ 12 सीटों पर हुई। इन सीटों पर एनडीए का पूरा वोट एक ही उम्मीदवार को गया, वहीं महागठबंधन के वोट उन्हीं सीटों पर गठबंधन के 2-3 उम्मीदवारों में बँट गए।

इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि बिहार में सबसे ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बावजूद राजद को केवल 25 सीटें ही क्यों मिलीं, इसमें कोई रहस्य नहीं है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती है। राजद के उम्मीदवार अपनी-अपनी सीटें हार गए, और यही बात मायने रखती है, पार्टी को मिले कुल वोट नहीं।

अगर किसी उम्मीदवार या पार्टी को लगता है कि मतगणना प्रक्रिया या परिणामों की घोषणा में कोई गड़बड़ी हुई है, तो वे याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए कोई ठोस वजह बताना पड़ता है। गौरतलब है कि मतगणना सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया उम्मीदवारों और पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में होती है।

बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में राहुल गाँधी और महागठबंधन के नेताओं ने जमकर शोर मचाया, लेकिन कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की। इसी तरह ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रही राजद या कॉन्ग्रेस का कोई भी उम्मीदवार परिणामों को कोर्ट में चुनौती देगा, इसकी संभावना नहीं दिख रही। ये सिर्फ ‘वोट चोरी’ का आरोप हर मंच पर लगाएँगे।

इसलिए सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद राजद ने इतनी कम सीटें कैसे जीतीं? इसका जवाब मिल गया होगा। यह किसी ‘वोट चोरी’ या किसी गड़बड़ी की ओर इशारा नहीं करता। यह संविधान सभा द्वारा अपनाई गई चुनाव प्रणाली के अनुसार है, और यह तब तक लागू रहेगा जब तक संविधान में बदलाव नहीं किया जाता और भारत कोई अलग चुनाव पद्धति नहीं अपना लेता।

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