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जब भी माना खत्म, ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़े हुए चिराग पासवान: PM मोदी के हनुमान से बिहार के दमदार खिलाड़ी तक, जानें- LJP को कैसे दी संजीवनी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ‘सबसे दमदार’ खिलाड़ी बने चिराग पासवान का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पिता रामविलास पासवान का साया सिर से उठने के बाद उन्होंने पार्टी में बगावत का दौर देखा। चाचा पशुपतिनाथ पासवान ने जब पार्टी पर कब्जा कर लिया, तो चिराग अकेले पड़ गए। लेकिन उन्होंने पीएम मोदी को कभी नहीं छोड़ा। हमेशा खुद को मोदी का हनुमान बताते रहे। चिराग पासवान को कभी चुका हुआ माना गया, तो कभी राजनीति पर छा गए। पिछले विधानसभा चुनाव में एक सीट जीते तो इस लोकसभा चुनाव 2024 में सभी 5 सीटें जीत ली। यहाँ तक कि जेडीयू के उतार चढ़ाव में भी उनका अहम किरदार रहा। 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में हुई थी बड़ी टूट राम विलास पासवान के भाई और हाजीपुर के पूर्व सांसद पशुपति कुमार पारस ने 2021 में एलजेपी को तोड़ दिया था। दरअसल उन्हें चिराग पासवान का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। ये टूट राम विलास पासवान के निधन के मात्र एक साल के भीतर हुई थी। इसके बाद चिराग पासवान ने एलजेपी रामविलास और पशुपतिनाथ पारस ने राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी के नाम से अलग-अलग दल बना ली। पशुपतिनाथ पारस को कैबिनेट में मिली थी जगह एलजेपी पर पशुपतिनाथ पारस के कब्जे के बाद एनडीए ने उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनाया था। दरअसल एलजेपी के सभी सांसद उनके साथ थे। उस वक्त भी चिराग पासवान ने अपनी सीमाएँ नहीं लाँघी। उन्होंने पीएम मोदी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि ये उनका अधिकार है कि टीम में वो किसे शामिल करेंगे, किसे नहीं। लेकिन पशुपतिनाथ पारस एलजेपी के सदस्य नहीं है, पार्टी तोड़ने के कार्य को देखते हुए उन्हें मंत्री न बनाया जाए, क्योंकि एलजीपी से उनका लेना देना नहीं है।” फिर भी पशुपति पारस मंत्री बने। चिराग पासवान ने इसके बाद भी पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। साल 2022 में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के साथ चले गए और बिहार में नई सरकार बना ली। इसकी वजह चिराग पासवान को बताया गया। ये वक्त राजनीति दृष्टिकोण से चिराग पासवान के लिए सबसे चुनौती भरा था। लेकिन यहीं से उन्होंने वापसी भी शुरू की। कहा जाता है कि आरजेडी और तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान को कई बार अपने पाले में करने की कोशिश की, लेकिन चिराग टस से मस नहीं हुए और खुद को ‘मोदी का हनुमान’ कहते रहे। नीतीश के एनडीए से अलग होकर भी उन्होंने बीजेपी को उपचुनावों में समर्थन किया। जाहिर है इन सीटों पर जीत का सेहरा भी चिराग के सिर चढ़ा। आगे चल कर इसका फायदा भी उन्हें मिला। 2024 में एनडीए से किनारे किए गए पशुपतिनाथ और चिराग छाए लोकसभा चुनाव 2024 में पशुपतिनाथ पारस की पार्टी राष्ट्र्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को एनडीए ने एक भी सीट बिहार में लड़ने के लिए नहीं दिया। यहाँ तक कि हाजीपुर सीट से वे खुद लड़ना चाहते थे, लेकिन एनडीए को मनाने में विफल रहे। इससे आहत होकर उन्होंने एनडीए छोड़ने का ऐलान किया। वहीं इस चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी को 5 सीटें दी। इनमें हाजीपुर की सीट भी शामिल थी। चिराग की एलजेपी रामविलास ने 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ सारी सीटें जीत ली। इससे चिराग पासवान का राजनीतिक कद काफी बढ़ा और केन्द्र में उन्हें मंत्री बनाया गया। इसके साथ ही राम विलास पासवान की विरासत पर चाचा पशुपति पारस के दावे को भी खत्म कर दिया। चिराग पासवान के जुड़ने और हटने का मतलब बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे। उस वक्त उनकी पार्टी ने काफी खराब प्रदर्शन किया था। एलजेपी (रामविलास) 135 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 1 सीट ही निकाल पाई। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, लेकिन सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ जमकर हमले किए। नतीजा ये हुआ कि जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़कर भी मात्र 43 सीटें जीत पाई। यानी इस चुनाव में चिराग पासवान जेडीयू के लिए ‘काल’ साबित हुए। दरअलस चिराग पासवान जब नीतीश कुमार के साथ नहीं थे, तो उन्होंने दिखा दिया कि वो नीतीश को कितना कमजोर कर सकते हैं। इस बार वो साथ थे तो अपनी ताकत भी दिखा दी। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की बात करें तो इस वक्त चिराग पासवान न सिर्फ एनडीए में शामिल थे, बल्कि जेडीयू के साथ भी उनका राजनीतिक समीकरण सही था। चुनाव में इसका असर भी दिखा और जेडीयू 85 सीटें जीत गई। चिराग पासवान ने भी 29 में से 19 सीटें जीतकर एनडीए को 200 पार पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। चिराग ने महागठबंधन से 17 सीटें छीन कर अपनी झोली में डाल ली। इससे उनका राजनीतिक कद और ऊँचा हो गया है। बिहार में दलितों के वे एकमात्र नेता हैं, उन्होंने ये एक बार फिर साबित कर दिया है। इंजीनियरिंग और फिल्मों के बाद राजनीति में आए चिराग चिराग पासवान की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। उन्होंने झांसी के एक कॉलेज से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया लेकिन तीसरे सेमेस्टर के बाद कॉलेज छोड़ दिया। इसके बाद फिल्मों की ओर रुख किया। 2011 में ‘मिले न मिले हम’ फिल्म में कंगना रनौत के साथ काम किया। हालाँकि ये फिल्म फ्लॉप हो गई और बॉलीवुड को बाय-बाय करते हुए उन्होंने पिता रामविलास पासवान की छत्रछाया में राजनीति में कदम रख दिया। राजनीतिक मौसम के वैज्ञानिक कहे जाते थे रामविलास पासवान चिराग पासवान के पिता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने 28 नवंबर 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की थी। पासवान समुदाय का बिहार में उन्हें एकमात्र नेता माना जाता था।बिहार विधानसभा चुनाव 2005 में उन्होंने 29 सीटें जीत ली थी। साथ ही 12 फीसदी वोट पाकर सबको चौंकाया था। 2014 में एनडीए गठबंधन में रामविलास पासवान के शामिल होने के पीछे चिराग को अहम वजह माना जाता है। राम विलास पासवान ने ही स्वीकार किया था कि उन्हें एनडीए में शामिल होने के लिए चिराग पासवान ने ही राजी किया। उससे पहले के चुनाव में भी LJP लगभग खत्म ही हो चुकी थी, लेकिन इस फैसले के बाद लोकसभा चुनाव 2014 में चिराग पासवान जमुई से सांसद चुने गए। 2019 में फिर वे जमुई से ही लड़े और दोबारा सांसद बने। साल 2024 में उन्होंने अपने पिता के चुनाव क्षेत्र हाजीपुर से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इस बार मोदी कैबिनेट में भी उन्हें जगह मिली और अब बिहार चुनाव में उन्होंने कहीं से भी खुद की पार्टी को NDA की कमजोर कड़ी साबित नहीं होने दिया, बल्कि कड़ी लड़ाई वाली सीटों पर भी NDA को जीत दिलाई। अब चिराग पासवान ने अपनी राजनीतिक समझदारी से उन सभी को जवाब दे दिया है, जो उन्हें सिर्फ मौसम वैज्ञानिक के बेटे और पार्ट-टाइम नेता समझते थे।   Click to listen highlighted text! जब भी माना खत्म, ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़े हुए चिराग पासवान: PM मोदी के हनुमान से बिहार के दमदार खिलाड़ी तक, जानें- LJP को कैसे दी संजीवनी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ‘सबसे दमदार’ खिलाड़ी बने चिराग पासवान का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पिता रामविलास पासवान का साया सिर से उठने के बाद उन्होंने पार्टी में बगावत का दौर देखा। चाचा पशुपतिनाथ पासवान ने जब पार्टी पर कब्जा कर लिया, तो चिराग अकेले पड़ गए। लेकिन उन्होंने पीएम मोदी को कभी नहीं छोड़ा। हमेशा खुद को मोदी का हनुमान बताते रहे। चिराग पासवान को कभी चुका हुआ माना गया, तो कभी राजनीति पर छा गए। पिछले विधानसभा चुनाव में एक सीट जीते तो इस लोकसभा चुनाव 2024 में सभी 5 सीटें जीत ली। यहाँ तक कि जेडीयू के उतार चढ़ाव में भी उनका अहम किरदार रहा। 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में हुई थी बड़ी टूट राम विलास पासवान के भाई और हाजीपुर के पूर्व सांसद पशुपति कुमार पारस ने 2021 में एलजेपी को तोड़ दिया था। दरअसल उन्हें चिराग पासवान का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। ये टूट राम विलास पासवान के निधन के मात्र एक साल के भीतर हुई थी। इसके बाद चिराग पासवान ने एलजेपी रामविलास और पशुपतिनाथ पारस ने राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी के नाम से अलग-अलग दल बना ली। पशुपतिनाथ पारस को कैबिनेट में मिली थी जगह एलजेपी पर पशुपतिनाथ पारस के कब्जे के बाद एनडीए ने उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनाया था। दरअसल एलजेपी के सभी सांसद उनके साथ थे। उस वक्त भी चिराग पासवान ने अपनी सीमाएँ नहीं लाँघी। उन्होंने पीएम मोदी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि ये उनका अधिकार है कि टीम में वो किसे शामिल करेंगे, किसे नहीं। लेकिन पशुपतिनाथ पारस एलजेपी के सदस्य नहीं है, पार्टी तोड़ने के कार्य को देखते हुए उन्हें मंत्री न बनाया जाए, क्योंकि एलजीपी से उनका लेना देना नहीं है।” फिर भी पशुपति पारस मंत्री बने। चिराग पासवान ने इसके बाद भी पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। साल 2022 में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के साथ चले गए और बिहार में नई सरकार बना ली। इसकी वजह चिराग पासवान को बताया गया। ये वक्त राजनीति दृष्टिकोण से चिराग पासवान के लिए सबसे चुनौती भरा था। लेकिन यहीं से उन्होंने वापसी भी शुरू की। कहा जाता है कि आरजेडी और तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान को कई बार अपने पाले में करने की कोशिश की, लेकिन चिराग टस से मस नहीं हुए और खुद को ‘मोदी का हनुमान’ कहते रहे। नीतीश के एनडीए से अलग होकर भी उन्होंने बीजेपी को उपचुनावों में समर्थन किया। जाहिर है इन सीटों पर जीत का सेहरा भी चिराग के सिर चढ़ा। आगे चल कर इसका फायदा भी उन्हें मिला। 2024 में एनडीए से किनारे किए गए पशुपतिनाथ और चिराग छाए लोकसभा चुनाव 2024 में पशुपतिनाथ पारस की पार्टी राष्ट्र्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को एनडीए ने एक भी सीट बिहार में लड़ने के लिए नहीं दिया। यहाँ तक कि हाजीपुर सीट से वे खुद लड़ना चाहते थे, लेकिन एनडीए को मनाने में विफल रहे। इससे आहत होकर उन्होंने एनडीए छोड़ने का ऐलान किया। वहीं इस चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी को 5 सीटें दी। इनमें हाजीपुर की सीट भी शामिल थी। चिराग की एलजेपी रामविलास ने 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ सारी सीटें जीत ली। इससे चिराग पासवान का राजनीतिक कद काफी बढ़ा और केन्द्र में उन्हें मंत्री बनाया गया। इसके साथ ही राम विलास पासवान की विरासत पर चाचा पशुपति पारस के दावे को भी खत्म कर दिया। चिराग पासवान के जुड़ने और हटने का मतलब बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे। उस वक्त उनकी पार्टी ने काफी खराब प्रदर्शन किया था। एलजेपी (रामविलास) 135 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 1 सीट ही निकाल पाई। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, लेकिन सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ जमकर हमले किए। नतीजा ये हुआ कि जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़कर भी मात्र 43 सीटें जीत पाई। यानी इस चुनाव में चिराग पासवान जेडीयू के लिए ‘काल’ साबित हुए। दरअलस चिराग पासवान जब नीतीश कुमार के साथ नहीं थे, तो उन्होंने दिखा दिया कि वो नीतीश को कितना कमजोर कर सकते हैं। इस बार वो साथ थे तो अपनी ताकत भी दिखा दी। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की बात करें तो इस वक्त चिराग पासवान न सिर्फ एनडीए में शामिल थे, बल्कि जेडीयू के साथ भी उनका राजनीतिक समीकरण सही था। चुनाव में इसका असर भी दिखा और जेडीयू 85 सीटें जीत गई। चिराग पासवान ने भी 29 में से 19 सीटें जीतकर एनडीए को 200 पार पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। चिराग ने महागठबंधन से 17 सीटें छीन कर अपनी झोली में डाल ली। इससे उनका राजनीतिक कद और ऊँचा हो गया है। बिहार में दलितों के वे एकमात्र नेता हैं, उन्होंने ये एक बार फिर साबित कर दिया है। इंजीनियरिंग और फिल्मों के बाद राजनीति में आए चिराग चिराग पासवान की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। उन्होंने झांसी के एक कॉलेज से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया लेकिन तीसरे सेमेस्टर के बाद कॉलेज छोड़ दिया। इसके बाद फिल्मों की ओर रुख किया। 2011 में ‘मिले न मिले हम’ फिल्म में कंगना रनौत के साथ काम किया। हालाँकि ये फिल्म फ्लॉप हो गई और बॉलीवुड को बाय-बाय करते हुए उन्होंने पिता रामविलास पासवान की छत्रछाया में राजनीति में कदम रख दिया। राजनीतिक मौसम के वैज्ञानिक कहे जाते थे रामविलास पासवान चिराग पासवान के पिता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने 28 नवंबर 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की थी। पासवान समुदाय का बिहार में उन्हें एकमात्र नेता माना जाता था।बिहार विधानसभा चुनाव 2005 में उन्होंने 29 सीटें जीत ली थी। साथ ही 12 फीसदी वोट पाकर सबको चौंकाया था। 2014 में एनडीए गठबंधन में रामविलास पासवान के शामिल होने के पीछे चिराग को अहम वजह माना जाता है। राम विलास पासवान ने ही स्वीकार किया था कि उन्हें एनडीए में शामिल होने के लिए चिराग पासवान ने ही राजी किया। उससे पहले के चुनाव में भी LJP लगभग खत्म ही हो चुकी थी, लेकिन इस फैसले के बाद लोकसभा चुनाव 2014 में चिराग पासवान जमुई से सांसद चुने गए। 2019 में फिर वे जमुई से ही लड़े और दोबारा सांसद बने। साल 2024 में उन्होंने अपने पिता के चुनाव क्षेत्र हाजीपुर से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इस बार मोदी कैबिनेट में भी उन्हें जगह मिली और अब बिहार चुनाव में उन्होंने कहीं से भी खुद की पार्टी को NDA की कमजोर कड़ी साबित नहीं होने दिया, बल्कि कड़ी लड़ाई वाली सीटों पर भी NDA को जीत दिलाई। अब चिराग पासवान ने अपनी राजनीतिक समझदारी से उन सभी को जवाब दे दिया है, जो उन्हें सिर्फ मौसम वैज्ञानिक के बेटे और पार्ट-टाइम नेता समझते थे।

जब भी माना खत्म, ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़े हुए चिराग पासवान: PM मोदी के हनुमान से बिहार के दमदार खिलाड़ी तक, जानें- LJP को कैसे दी संजीवनी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ‘सबसे दमदार’ खिलाड़ी बने चिराग पासवान का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पिता रामविलास पासवान का साया सिर से उठने के बाद उन्होंने पार्टी में बगावत का दौर देखा। चाचा पशुपतिनाथ पासवान ने जब पार्टी पर कब्जा कर लिया, तो चिराग अकेले पड़ गए। लेकिन उन्होंने पीएम मोदी को कभी नहीं छोड़ा। हमेशा खुद को मोदी का हनुमान बताते रहे।

चिराग पासवान को कभी चुका हुआ माना गया, तो कभी राजनीति पर छा गए। पिछले विधानसभा चुनाव में एक सीट जीते तो इस लोकसभा चुनाव 2024 में सभी 5 सीटें जीत ली। यहाँ तक कि जेडीयू के उतार चढ़ाव में भी उनका अहम किरदार रहा।

2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में हुई थी बड़ी टूट

राम विलास पासवान के भाई और हाजीपुर के पूर्व सांसद पशुपति कुमार पारस ने 2021 में एलजेपी को तोड़ दिया था। दरअसल उन्हें चिराग पासवान का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। ये टूट राम विलास पासवान के निधन के मात्र एक साल के भीतर हुई थी। इसके बाद चिराग पासवान ने एलजेपी रामविलास और पशुपतिनाथ पारस ने राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी के नाम से अलग-अलग दल बना ली।

पशुपतिनाथ पारस को कैबिनेट में मिली थी जगह

एलजेपी पर पशुपतिनाथ पारस के कब्जे के बाद एनडीए ने उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनाया था। दरअसल एलजेपी के सभी सांसद उनके साथ थे। उस वक्त भी चिराग पासवान ने अपनी सीमाएँ नहीं लाँघी। उन्होंने पीएम मोदी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि ये उनका अधिकार है कि टीम में वो किसे शामिल करेंगे, किसे नहीं। लेकिन पशुपतिनाथ पारस एलजेपी के सदस्य नहीं है, पार्टी तोड़ने के कार्य को देखते हुए उन्हें मंत्री न बनाया जाए, क्योंकि एलजीपी से उनका लेना देना नहीं है।” फिर भी पशुपति पारस मंत्री बने। चिराग पासवान ने इसके बाद भी पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया।

साल 2022 में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के साथ चले गए और बिहार में नई सरकार बना ली। इसकी वजह चिराग पासवान को बताया गया। ये वक्त राजनीति दृष्टिकोण से चिराग पासवान के लिए सबसे चुनौती भरा था। लेकिन यहीं से उन्होंने वापसी भी शुरू की।

कहा जाता है कि आरजेडी और तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान को कई बार अपने पाले में करने की कोशिश की, लेकिन चिराग टस से मस नहीं हुए और खुद को ‘मोदी का हनुमान’ कहते रहे। नीतीश के एनडीए से अलग होकर भी उन्होंने बीजेपी को उपचुनावों में समर्थन किया। जाहिर है इन सीटों पर जीत का सेहरा भी चिराग के सिर चढ़ा। आगे चल कर इसका फायदा भी उन्हें मिला।

2024 में एनडीए से किनारे किए गए पशुपतिनाथ और चिराग छाए

लोकसभा चुनाव 2024 में पशुपतिनाथ पारस की पार्टी राष्ट्र्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को एनडीए ने एक भी सीट बिहार में लड़ने के लिए नहीं दिया। यहाँ तक कि हाजीपुर सीट से वे खुद लड़ना चाहते थे, लेकिन एनडीए को मनाने में विफल रहे। इससे आहत होकर उन्होंने एनडीए छोड़ने का ऐलान किया।

वहीं इस चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी को 5 सीटें दी। इनमें हाजीपुर की सीट भी शामिल थी। चिराग की एलजेपी रामविलास ने 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ सारी सीटें जीत ली। इससे चिराग पासवान का राजनीतिक कद काफी बढ़ा और केन्द्र में उन्हें मंत्री बनाया गया। इसके साथ ही राम विलास पासवान की विरासत पर चाचा पशुपति पारस के दावे को भी खत्म कर दिया।

चिराग पासवान के जुड़ने और हटने का मतलब

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे। उस वक्त उनकी पार्टी ने काफी खराब प्रदर्शन किया था। एलजेपी (रामविलास) 135 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 1 सीट ही निकाल पाई। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, लेकिन सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ जमकर हमले किए।

नतीजा ये हुआ कि जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़कर भी मात्र 43 सीटें जीत पाई। यानी इस चुनाव में चिराग पासवान जेडीयू के लिए ‘काल’ साबित हुए। दरअलस चिराग पासवान जब नीतीश कुमार के साथ नहीं थे, तो उन्होंने दिखा दिया कि वो नीतीश को कितना कमजोर कर सकते हैं। इस बार वो साथ थे तो अपनी ताकत भी दिखा दी।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की बात करें तो इस वक्त चिराग पासवान न सिर्फ एनडीए में शामिल थे, बल्कि जेडीयू के साथ भी उनका राजनीतिक समीकरण सही था। चुनाव में इसका असर भी दिखा और जेडीयू 85 सीटें जीत गई।

चिराग पासवान ने भी 29 में से 19 सीटें जीतकर एनडीए को 200 पार पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। चिराग ने महागठबंधन से 17 सीटें छीन कर अपनी झोली में डाल ली। इससे उनका राजनीतिक कद और ऊँचा हो गया है। बिहार में दलितों के वे एकमात्र नेता हैं, उन्होंने ये एक बार फिर साबित कर दिया है।

इंजीनियरिंग और फिल्मों के बाद राजनीति में आए चिराग

चिराग पासवान की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। उन्होंने झांसी के एक कॉलेज से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया लेकिन तीसरे सेमेस्टर के बाद कॉलेज छोड़ दिया। इसके बाद फिल्मों की ओर रुख किया। 2011 में ‘मिले न मिले हम’ फिल्म में कंगना रनौत के साथ काम किया। हालाँकि ये फिल्म फ्लॉप हो गई और बॉलीवुड को बाय-बाय करते हुए उन्होंने पिता रामविलास पासवान की छत्रछाया में राजनीति में कदम रख दिया।

राजनीतिक मौसम के वैज्ञानिक कहे जाते थे रामविलास पासवान

चिराग पासवान के पिता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने 28 नवंबर 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की थी। पासवान समुदाय का बिहार में उन्हें एकमात्र नेता माना जाता था।बिहार विधानसभा चुनाव 2005 में उन्होंने 29 सीटें जीत ली थी। साथ ही 12 फीसदी वोट पाकर सबको चौंकाया था।

2014 में एनडीए गठबंधन में रामविलास पासवान के शामिल होने के पीछे चिराग को अहम वजह माना जाता है। राम विलास पासवान ने ही स्वीकार किया था कि उन्हें एनडीए में शामिल होने के लिए चिराग पासवान ने ही राजी किया। उससे पहले के चुनाव में भी LJP लगभग खत्म ही हो चुकी थी, लेकिन इस फैसले के बाद लोकसभा चुनाव 2014 में चिराग पासवान जमुई से सांसद चुने गए। 2019 में फिर वे जमुई से ही लड़े और दोबारा सांसद बने।

साल 2024 में उन्होंने अपने पिता के चुनाव क्षेत्र हाजीपुर से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इस बार मोदी कैबिनेट में भी उन्हें जगह मिली और अब बिहार चुनाव में उन्होंने कहीं से भी खुद की पार्टी को NDA की कमजोर कड़ी साबित नहीं होने दिया, बल्कि कड़ी लड़ाई वाली सीटों पर भी NDA को जीत दिलाई। अब चिराग पासवान ने अपनी राजनीतिक समझदारी से उन सभी को जवाब दे दिया है, जो उन्हें सिर्फ मौसम वैज्ञानिक के बेटे और पार्ट-टाइम नेता समझते थे।

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